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गोरखपुर में जलभराव से मिलेगी राहत, 750 करोड़ के प्रोजेक्ट से अपग्रेड होगा Urban Flood Management

On: November 6, 2025
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गोरखपुर में जलभराव से मिलेगी राहत, Urban Flood Management
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गोरखपुर, 06 नवंबर 2025 (गुरुवार)। शहर में बरसात के मौसम में होने वाली जलभराव की समस्या अब इतिहास बन सकती है। नगर निगम के Urban Flood Management Cell (UFMC) को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है, जिसके बाद National Disaster Management Authority (NDMA) ने इसके उन्नयन के लिए 750 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान करने पर सैद्धांतिक सहमति जताई है। इस महत्वपूर्ण परियोजना का लक्ष्य है—शहर में अत्याधुनिक ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सिस्टम लागू करना, जो बारिश के पानी को नियंत्रित तरीके से प्रबंधित कर सके।

🌧️ Urban Flood Management पर राष्ट्रीय सहयोग

योजना के पहले चरण में 222 करोड़ रुपये की धनराशि मिलेगी।

  • 90% राशि केंद्र सरकार
  • 10% राशि राज्य सरकार वहन करेगी।
    कुल राशि में से 200 करोड़ भारत सरकार और 22 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश सरकार जारी करेगी। नगर निगम के लिए यह बड़ा कदम है, क्योंकि इस फंडिंग से न सिर्फ तकनीकी उन्नयन होगा, बल्कि शहर के जल-जमाव की पुरानी समस्या का वैज्ञानिक समाधान भी संभव होगा।

नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवाल के अनुसार, “यह परियोजना गोरखपुर के भविष्य के लिए मील का पत्थर साबित होगी। डीपीआर तैयार की जा रही है, जिसे जल्द ही एनडीएमए को भेजा जाएगा।”

🔍 यूएफएमसी में बड़े बदलाव:

1️⃣ Rainfall Data Collection होगा हाई-टेक

अब तक शहर में सिर्फ 2 Automatic Rain Gauges (ARG) लगे थे—चरगांव और डीएम कार्यालय में। अपग्रेडेशन के बाद इनकी संख्या 20 तक बढ़ाई जाएगी।
इनका इस्तेमाल बारिश का रियल-टाइम डाटा जुटाने के लिए होगा, जिससे नालों के जलस्तर एवं जलभराव का पूर्वानुमान सटीकता से लगाया जा सकेगा।

2️⃣ नालों पर लगेंगे वाटर लेवल रिकॉर्डर

शहर के सभी प्रमुख व मझोले नालों पर Automatic Water Level Recorders (AWLRs) लगाए जाएंगे। इससे बारिश के दिनों में पानी का स्तर बढ़ने पर तुरंत चेतावनी और आवश्यक कार्रवाई की जा सकेगी।

🌿 ‘Green Development’ के तहत प्राकृतिक जल प्रबंधन

परियोजना में शहरी नालों के जल को प्राकृतिक तरीके से शुद्ध करने की व्यवस्था की जाएगी—जैसे तकिया घाट मॉडल
साथ ही रामगढ़ ताल, चिलुवा ताल, सुमेर सागर, महेसरा जैसे wetlands का संरक्षण और सौंदर्यीकरण होगा।
कंक्रीट की जगह प्रकृति-आधारित सामग्री के उपयोग पर विशेष जोर दिया जाएगा, ताकि इको-फ्रेंडली डेवलपमेंट हो सके।

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