वाराणसी/मंगलवार, 3 नवंबर 2026: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मंगलवार को वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) पहुंचीं। यहां कर्नाटक संगीत के महान संगीतज्ञ मुथुस्वामी दीक्षितार की 250वीं जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में उन्होंने स्मारक सिक्के का लोकार्पण किया। आईआईटी बीएचयू के भारतीय ज्ञान परंपरा उत्कृष्टता केंद्र की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में संगीत, भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा हुई। वित्त मंत्री ने महामना मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि भी दी।
बीएचयू में मुथुस्वामी दीक्षितार की 250वीं जयंती पर स्मारक सिक्का जारी
मुथुस्वामी दीक्षितार की 250वीं जयंती के उपलक्ष्य में बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में विशेष समारोह का आयोजन किया गया। आईआईटी बीएचयू के भारतीय ज्ञान परंपरा उत्कृष्टता केंद्र (सीओई-आईकेएस) की ओर से आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्मारक सिक्के का लोकार्पण किया।
कार्यक्रम दोपहर 2:15 बजे शुरू हुआ। इस दौरान वित्त मंत्री ने मुथुस्वामी दीक्षितार के संगीत और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में उनके योगदान को याद किया। आयोजन में कर्नाटक संगीत की विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता डॉ. सुमित्रा वासुदेव ने अपनी प्रस्तुति से शास्त्रीय संगीत की परंपरा को जीवंत किया।
समारोह में भारतीय ज्ञान परंपरा और शास्त्रीय संगीत के महत्व को रेखांकित किया गया। बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में इस आयोजन को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार से जोड़कर देखा जा रहा है।
महामना मदन मोहन मालवीय को भी निर्मला सीतारमण ने दी श्रद्धांजलि
बीएचयू पहुंचने पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इसके बाद उन्होंने समारोह को संबोधित किया।
बीएचयू की स्थापना महामना के शैक्षिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण उदाहरण है। ऐसे में मुथुस्वामी दीक्षितार की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में महामना को श्रद्धांजलि देना भारतीय शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान का प्रतीक रहा।
कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति में शामिल थे मुथुस्वामी दीक्षितार
मुथुस्वामी दीक्षितार कर्नाटक संगीत के महान रचनाकारों में गिने जाते हैं। त्यागराज और श्यामा शास्त्री के साथ उन्हें कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति का हिस्सा माना जाता है। इन तीनों संगीतज्ञों ने दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुथुस्वामी दीक्षितार की रचनाओं में संस्कृत भाषा, भारतीय दर्शन और शास्त्रीय रागों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने लगभग 450 से 500 रचनाओं की रचना की, जिनमें से अनेक आज भी संगीत समारोहों और शास्त्रीय प्रस्तुतियों में गाई जाती हैं।
उनकी कृतियां केवल संगीत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपराओं की झलक भी प्रस्तुत करती हैं।
काशी से भी जुड़ा रहा मुथुस्वामी दीक्षितार का जीवन
मुथुस्वामी दीक्षितार ने अपने जीवन में कई धार्मिक स्थलों की यात्रा की। इन यात्राओं के दौरान उन्होंने विभिन्न मंदिरों और देवी-देवताओं पर आधारित संगीत रचनाएं तैयार कीं। उनकी रचनाओं में मंदिरों की आध्यात्मिक महत्ता और भारतीय दर्शन का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
काशी से भी उनका विशेष संबंध रहा। वह यहां लंबे समय तक रहे थे। ऐसे में वाराणसी स्थित बीएचयू में उनकी 250वीं जयंती पर स्मारक सिक्के का लोकार्पण सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण आयोजन माना जा रहा है।
मुथुस्वामी दीक्षितार की संगीत विरासत आज भी कर्नाटक संगीत के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।








