नई दिल्ली/04 जून 2026। वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले देश की चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण यानी परिसीमन की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रही है। सरकार इस संवेदनशील विषय पर राजनीतिक सहमति बनाने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ लगातार संवाद कर रही है, ताकि भविष्य में किसी बड़े विवाद की स्थिति से बचा जा सके।
सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार एक नए परिसीमन विधेयक की संभावना पर विचार कर रही है और चाहती है कि आगामी लोकसभा चुनावों से पहले इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन हासिल किया जाए। यही वजह है कि सरकार ने उन दलों से भी बातचीत शुरू की है, जो पहले इस मुद्दे पर अपनी आशंकाएं जता चुके हैं।
क्षेत्रीय दलों से संवाद पर जोर
सरकार द्वारा जिन प्रमुख दलों से बातचीत की गई है, उनमें डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे प्रभावशाली क्षेत्रीय दल शामिल हैं। इसके अलावा कई अन्य राज्यों के राजनीतिक दलों के साथ भी विचार-विमर्श जारी है। केंद्र का प्रयास है कि परिसीमन को किसी राजनीतिक टकराव का विषय बनाने के बजाय राष्ट्रीय सहमति के आधार पर आगे बढ़ाया जाए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनती है तो यह स्वतंत्र भारत के चुनावी इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रियाओं में से एक साबित हो सकती है।
क्या है परिसीमन और क्यों है महत्वपूर्ण?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। वर्तमान में लोकसभा सीटों का आवंटन मुख्य रूप से 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर तय व्यवस्था पर आधारित है।
हालांकि देश की जनसंख्या और जनसांख्यिकीय संरचना में पिछले पांच दशकों के दौरान व्यापक बदलाव आया है। ऐसे में परिसीमन लागू होने पर विभिन्न राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व में बदलाव देखने को मिल सकता है। यही कारण है कि यह विषय राजनीतिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रतिनिधित्व के संतुलन पर उठ रही हैं चिंताएं
परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी चिंता उन राज्यों की ओर से सामने आती रही है, जिन्होंने पिछले दशकों में जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। इन राज्यों का मानना है कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया गया, तो उनके संसदीय प्रतिनिधित्व पर प्रभाव पड़ सकता है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार इन चिंताओं से पूरी तरह अवगत है और ऐसा संतुलित फार्मूला तैयार करने की दिशा में काम कर रही है, जिसे अधिकांश राजनीतिक दल स्वीकार कर सकें। सरकार का उद्देश्य निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के साथ-साथ संघीय ढांचे के संतुलन को भी बनाए रखना है।
आम सहमति के आधार पर आगे बढ़ेगी प्रक्रिया
केंद्र सरकार का मानना है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाजी के बजाय संवाद और सहमति का रास्ता अपनाना आवश्यक है। यही वजह है कि विधायी प्रक्रिया शुरू करने से पहले विभिन्न राजनीतिक दलों, राज्यों और हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा की जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि अब तक हुई बातचीत सकारात्मक रही है और सरकार एक व्यापक रूपरेखा तैयार करने के करीब पहुंच रही है। परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद विधेयक को लेकर अगला कदम उठाया जा सकता है।
2029 के चुनाव से पहले बड़ा संवैधानिक बदलाव संभव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो इसका प्रभाव केवल लोकसभा सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। यह संसदीय प्रतिनिधित्व, राज्यों के राजनीतिक प्रभाव, संघीय संतुलन और भविष्य के चुनावी नक्शे को भी प्रभावित कर सकता है।
ऐसे में आगामी वर्षों में परिसीमन भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहने वाला है। 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले इस दिशा में उठाया गया कोई भी कदम देश की लोकतांत्रिक संरचना पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।












