नई दिल्ली/मंगलवार, 29 सितंबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और उसके फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करने पर सहमति जताई है। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले बहुसदस्यीय चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। मामले का उल्लेख मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष किया गया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि बहुसदस्यीय चुनाव आयोग में फैसले नियमानुसार सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए। याचिका में इसी निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर क्या है याचिका में सवाल?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को सामूहिक रूप से दी गई शक्तियों का इस्तेमाल अकेले नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने अदालत से आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया और संबंधित रिकॉर्ड की जांच करने का अनुरोध किया है।
रिपोर्टों के मुताबिक, याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR तथा मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को भी चुनौती दी गई है। याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि क्या आयोग के सामूहिक अधिकारों का इस्तेमाल मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा अकेले किया जा सकता है।
मामले में याचिकाकर्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त से यह बताने को भी कहा है कि उन्होंने किस वैधानिक अधिकार के तहत आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल व्यक्तिगत रूप से किया। रिपोर्टों के अनुसार, याचिका में संबंधित फैसलों और कार्रवाइयों की वैधता पर न्यायिक जांच की मांग की गई है।
14 बार आपत्ति जताने की रिपोर्ट से उठा विवाद
याचिका ऐसे समय में सामने आई है, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के नाम पर लिए गए कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि इनमें मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने-हटाने, मतदाता सूची और चुनावी डेटा से जुड़े मामले शामिल थे।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में यह आपत्ति दर्ज की कि संबंधित निर्णय उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना जारी किए गए थे। इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक चर्चा तेज हुई।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद अलग रुख रखा। आयोग के अधिकारियों ने कहा कि SIR समेत चुनाव आयोग के सभी निर्णय तीनों आयुक्तों की मंजूरी से और सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान मतभेद होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि जिन आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई है, उनमें से कुछ पत्र कैबिनेट सचिव को अधिकारी की प्रतिनियुक्ति से जुड़े प्रशासनिक मामले में भेजे गए थे। आयोग ने इन्हें SIR या चुनाव नीति पर असहमति के रूप में पेश किए जाने पर आपत्ति जताई है।
इस तरह एक ओर मीडिया रिपोर्टों में कुछ फैसलों को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख है, वहीं आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि उसके अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
SIR को लेकर भी उठे हैं सवाल
इस पूरे विवाद का एक अहम हिस्सा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) है। इस प्रक्रिया के दौरान मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े फैसलों पर भी सवाल उठाए गए हैं।
रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग ने मतदाता पंजीकरण फॉर्म, चुनावी डेटा तक पहुंच और अपने आईटी सिस्टम की निगरानी से संबंधित कुछ फैसलों की घोषणा भी की।
अब सुप्रीम कोर्ट में अगले सप्ताह होने वाली सुनवाई में यह मामला न्यायिक जांच के दायरे में आएगा। हालांकि, अदालत ने अभी याचिका में लगाए गए आरोपों की सत्यता या आयोग की कार्यप्रणाली की वैधता पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। अगली सुनवाई में याचिका में उठाए गए कानूनी सवालों पर अदालत का रुख महत्वपूर्ण होगा।













