लखनऊ (05 मई 2026): यूपी में स्मार्ट मीटर विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े रुख के बाद जहां राज्य में स्मार्ट प्रीपेड मीटर की व्यवस्था को खत्म कर दिया गया, वहीं अब इस पूरे मामले में जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया तेज हो गई है।
विद्युत नियामक आयोग ने पावर कारपोरेशन प्रबंधन की देरी को गंभीरता से लेते हुए 24 घंटे के भीतर जवाब देने का सख्त निर्देश जारी किया है। यह घटनाक्रम साफ संकेत देता है कि सरकार और नियामक संस्थाएं अब इस मुद्दे पर ढील देने के मूड में नहीं हैं।
10 दिन की मोहलत भी बेअसर, अब 24 घंटे का अल्टीमेटम
दरअसल, उपभोक्ताओं की लगातार शिकायतों के बाद मामला आयोग तक पहुंचा था। उपभोक्ता परिषद की याचिका पर 16 अप्रैल को आयोग ने पावर कारपोरेशन से 10 दिनों के भीतर जवाब मांगा था।
लेकिन तय समयसीमा खत्म होने के बाद भी जवाब दाखिल नहीं किया गया। यहां तक कि 20 दिन गुजरने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
अब आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक को 24 घंटे के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया है। आयोग ने साफ चेतावनी दी है कि यदि समय पर जवाब नहीं मिला तो दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
स्मार्ट प्रीपेड मीटर व्यवस्था पर लगा ब्रेक
यूपी में स्मार्ट मीटर विवाद की जड़ में वही स्मार्ट प्रीपेड मीटर हैं, जिन्हें लेकर उपभोक्ताओं में भारी नाराजगी थी।
सीएम योगी के हस्तक्षेप के बाद पावर कारपोरेशन ने इस व्यवस्था को समाप्त करने का फैसला लिया। हालांकि, यह कदम जितनी तेजी से लागू हुआ, उतने ही सवाल भी खड़े हो गए—खासतौर पर प्रक्रिया और नियमों के पालन को लेकर।
उपभोक्ता परिषद ने उठाए गंभीर सवाल
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने इस मामले को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। उनका कहना है कि पावर कारपोरेशन ने विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) और केंद्र सरकार व केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है।
वर्मा के अनुसार:
- नए बिजली कनेक्शन केवल प्रीपेड मोड में दिए जा रहे थे
- पुराने पोस्टपेड कनेक्शनों को बिना उपभोक्ता की सहमति के प्रीपेड में बदला गया
- आयोग की कास्ट डेटा बुक के नियमों का पालन नहीं किया गया
इन आरोपों के बाद परिषद ने आयोग से मांग की है कि पावर कारपोरेशन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
क्या हो सकती है आगे की कार्रवाई?
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब सबकी नजर आयोग के अगले कदम पर टिकी है। यदि 24 घंटे के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तो पावर कारपोरेशन प्रबंधन के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई तय मानी जा रही है।
यूपी में स्मार्ट मीटर विवाद केवल तकनीकी बदलाव का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह अब उपभोक्ता अधिकारों, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मामला बन चुका है।
उपभोक्ताओं के लिए क्या मायने?
इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर आम बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। स्मार्ट प्रीपेड मीटर व्यवस्था खत्म होने से फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन भविष्य में नई नीति कैसी होगी—यह आयोग और सरकार के फैसलों पर निर्भर करेगा।













