नई दिल्ली/4 नवंबर 2026: सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन व्यवस्था लागू करने की मांग पर सुनवाई हुई। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं से हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि वे गलत नंबर डायल कर रहे हैं और उन्हें विरोध-प्रदर्शन करना चाहिए। अदालत में यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब देश में विभिन्न मुद्दों को लेकर विरोध-प्रदर्शन जारी हैं।
याचिका में संसद और राज्य विधानसभाओं की आरक्षित सीटों को अनिवार्य रूप से बदलने यानी रोटेशन करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने से लोकतांत्रिक विकल्प सीमित हो सकते हैं।
SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सुनवाई के दौरान CJI की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने जब याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, तो उन्होंने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि वे अदालत क्यों आए हैं और विरोध-प्रदर्शन का रास्ता क्यों नहीं अपनाया?
सीजेआई ने मजाकिया अंदाज में कहा, “आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं, यह तो विरोध-प्रदर्शनों का दौर है। शायद आपको भी ऐसा ही करना चाहिए।”
इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने जवाब दिया कि उनका विरोध करने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने हल्के अंदाज में यह भी कहा कि उनका गला खराब है, इसलिए विरोध-प्रदर्शन करना उनके लिए आसान नहीं होगा।
सात दशक से अधिक समय से आरक्षित है कादीपुर विधानसभा सीट
यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ी है। यहां के मतदाता जगदीश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि आजादी के बाद सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यह विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित क्यों बनी हुई है? उनका कहना है कि 1952 में हुए पहले आम चुनाव के बाद से सीट के आरक्षण में बदलाव नहीं किया गया है।
याचिका में दावा किया गया है कि लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अवसर सीमित हो सकते हैं।
‘केवल चार-पांच परिवारों को ही मिला फायदा’
याचिकाकर्ता जगदीश सिंह का कहना है कि कादीपुर विधानसभा सीट के लगातार आरक्षित रहने से केवल चार-पांच परिवारों को ही इसका लाभ मिला है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि संबंधित अधिकारियों को विधानसभा सीटों के आरक्षण में रोटेशन व्यवस्था लागू करने पर विचार करने का निर्देश दिया जाए।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पंचायतों और नगर निकायों के चुनाव में आरक्षण के लिए रोटेशन की व्यवस्था पहले से लागू है। ऐसे में विधानसभा और संसद के निर्वाचन क्षेत्रों में भी इसी तरह की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।
उनका दावा है कि रोटेशन नहीं होने से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 के तहत मिले अधिकार प्रभावित होते हैं। साथ ही, मतदाताओं के सामने उम्मीदवार चुनने के विकल्प भी सीमित हो जाते हैं।
मतदान जाति के आधार पर ही होता है, यह मानना सही नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर विचार किया।
अदालत ने कहा कि यह मान लेना उचित नहीं है कि मतदान हमेशा जाति के आधार पर ही होता है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता की दलील इस धारणा पर आधारित है कि बहुसंख्यक समुदाय जाति या समुदाय के आधार पर ही मतदान करेगा। लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है।
पीठ ने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक विकल्पों को लेकर अदालत कोई न्यायिक फैसला नहीं सुना सकती। मतदाता किस उम्मीदवार को चुनेंगे, यह उनका अपना निर्णय है।
आरक्षित सीट पर मतदान का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि किसी निर्वाचन क्षेत्र के आरक्षित होने से मतदाताओं के मतदान के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता।
उन्होंने कहा कि मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। वे किसी भी समुदाय के उम्मीदवार को वोट दे सकते हैं। केवल इस आधार पर कि कोई सीट आरक्षित है, यह दावा करना कि मतदाता अपने समुदाय के उम्मीदवार को वोट नहीं दे सकते, वैध तर्क नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव लड़ने का अधिकार किसी एक निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित नहीं है। कोई व्यक्ति अन्य गैर-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से भी चुनाव लड़ सकता है।
आरक्षण में रोटेशन की मांग पर क्या है आगे का रास्ता?
कादीपुर विधानसभा सीट को लेकर दायर इस याचिका ने आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन व्यवस्था की मांग को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। याचिकाकर्ता का मानना है कि लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अवसर कुछ परिवारों तक सीमित हो सकते हैं।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर केवल जाति आधारित मतदान की धारणा के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। आरक्षण और निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण से जुड़े सवालों पर संवैधानिक प्रावधानों तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ध्यान में रखना होगा।













