नई दिल्ली/4 नवंबर 2026: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए कानूनी कार्रवाई से मिली पूर्ण छूट का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। अदालत ने इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है।
बुधवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने वकील एवं सामाजिक कार्यकर्ता अरुण कुमार अग्रवाल की याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 को चुनौती दी गई है।
यह मामला चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसके अधिकारियों की जवाबदेही के बीच संतुलन से जुड़ा है।
क्या है CEC को मिली ब्लैंकेट इम्यूनिटी?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 में चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के संबंध में कानूनी कार्रवाई से संरक्षण दिया गया है।
याचिकाकर्ता ने इसी प्रावधान पर सवाल उठाते हुए कहा है कि चुनाव आयुक्तों को इस तरह की पूर्ण छूट देना संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। उनका तर्क है कि किसी भी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ जवाबदेही भी बनी रहनी चाहिए।
‘पूर्ण छूट के बिना भी चुनाव आयोग प्रभावी ढंग से काम कर सकता है’
याचिका में कहा गया है कि भारत निर्वाचन आयोग ने कई दशकों तक सफलतापूर्वक चुनाव कराए हैं। उस दौरान आयोग के सदस्यों को कानूनी कार्रवाई से पूर्ण छूट देने वाला ऐसा प्रावधान मौजूद नहीं था।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इससे साबित होता है कि आयोग अपने अधिकारियों को पूरी कानूनी छूट दिए बिना भी प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों को परेशान करने वाली या बेबुनियाद कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए दूसरे विकल्प अपनाए जा सकते हैं। इनमें निराधार शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा उपाय और उचित न्यायिक जांच की व्यवस्था शामिल हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि पूर्ण छूट देना आवश्यकता से अधिक है और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जरूरी सीमा से आगे जाता है।
मतदाता और उम्मीदवारों के कानूनी अधिकारों पर उठाए सवाल
याचिका में धारा 16 के प्रभाव को लेकर कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण भी दिए गए हैं। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह प्रावधान मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के कार्यों के खिलाफ सिविल या आपराधिक कानूनी उपायों को समाप्त कर सकता है।
इस संदर्भ में याचिका में तीन स्थितियों का उल्लेख किया गया है:
- मतदाता: यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से गलत तरीके से हटा दिया जाता है, तो उसके पास संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का विकल्प सीमित हो सकता है।
- उम्मीदवार: यदि किसी उम्मीदवार को कथित रूप से दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई से नुकसान पहुंचता है, तो वह कानूनी उपायों से वंचित हो सकता है।
- नागरिक: यदि कोई नागरिक चुनाव आयोग के कामकाज या कथित भ्रष्टाचार से प्रभावित होता है, तो उसे न्याय पाने में कठिनाई हो सकती है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की पूर्ण छूट नागरिकों के कानूनी अधिकारों और संवैधानिक जवाबदेही के सिद्धांत को प्रभावित कर सकती है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही
चुनाव आयोग देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था है। उसके अधिकारियों को कामकाज के दौरान अनावश्यक दबाव और बेबुनियाद मुकदमों से बचाना महत्वपूर्ण माना जाता है।
लेकिन दूसरी ओर, यह सवाल भी उठता है कि यदि किसी आधिकारिक कार्रवाई से नागरिकों या उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचता है, तो उनके पास न्याय पाने का पर्याप्त रास्ता होना चाहिए या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका इसी संवैधानिक संतुलन पर विचार करने की मांग करती है। अदालत का अंतिम फैसला यह स्पष्ट कर सकता है कि चुनाव आयुक्तों को दिया गया कानूनी संरक्षण किस सीमा तक उचित है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। धारा 16 की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय आना बाकी है।













