नई दिल्ली, 10 नवंबर 2025 — भारत की न्याय व्यवस्था में अब AI के इस्तेमाल को लेकर एक नया अध्याय खुलने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस मुद्दे पर दाखिल याचिका पर सुनवाई करने की सहमति जताई है, जिसमें मांग की गई है कि न्यायिक कार्यों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश (guidelines) तय किए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता: गलत सूचनाओं का खतरा
प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई (CJI B.R. Gavai) ने इस सुनवाई के दौरान एआई के संभावित दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हाल ही में इंटरनेट पर प्रसारित एक रूपांतरित (manipulated) वीडियो ने न्यायपालिका की गरिमा पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया। उस वीडियो में उन्हें और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन को गलत तरीके से दिखाया गया था, जैसे किसी ने अदालत में जूता फेंकने की कोशिश की हो।
सीजेआई ने टिप्पणी की — “हमें इस बात की जानकारी है। हमने वह वीडियो देखा है, लेकिन इस तरह की चीजें न्यायपालिका की साख को नुकसान पहुंचा सकती हैं।”
याचिका में क्या मांग की गई?
यह याचिका अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव द्वारा दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि बिना नियंत्रण के AI टूल्स का प्रयोग न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है। याचिका में चेतावनी दी गई कि जनरेटिव एआई सिस्टम (Generative AI Systems) अक्सर ‘ब्लैक बॉक्स’ की तरह काम करते हैं, यानी उनका निर्णय लेने वाला तंत्र (logic system) उनके निर्माताओं तक के लिए अस्पष्ट रहता है।
इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे सिस्टम्स में ‘सिस्टमेटिक बायस (systematic bias)’ शामिल हो सकता है, जिससे न्यायिक परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। एआई द्वारा तैयार डाटा की पारदर्शिता (transparency) और स्वामित्व (ownership) को लेकर नीति बनाना अत्यंत आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट में एआई की भूमिका और चुनौती
गौरतलब है कि हाल के महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में एआई-आधारित ट्रांसक्रिप्शन टूल्स और डिजिटल कोर्ट असिस्टेंस सिस्टम का प्रयोग शुरू किया है। हालांकि यह कदम तकनीकी प्रगति की दिशा में है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते स्पष्ट नीति नहीं बनी, तो न्यायिक निष्पक्षता (judicial impartiality) पर सवाल उठ सकते हैं।
एक वरिष्ठ वकील ने कहा, “AI in Judiciary तभी प्रभावी हो सकता है जब उसके डेटा स्रोत निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र हों। अन्यथा यह न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ जाएगा।”
पीएम मोदी ने भी की थी बातचीत
यह मामला तब और सुर्खियों में आया जब कुछ सप्ताह पहले एक 71 वर्षीय वकील ने मुख्य न्यायाधीश के कोर्ट रूम में जूता फेंकने का प्रयास किया था। इस घटना की निंदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की थी और उन्होंने सीधे सीजेआई से बात कर चिंता व्यक्त की थी।
इस घटना ने यह सवाल भी उठाया कि इंटरनेट पर प्रसारित गलत सूचनाएं और AI-generated fake content न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को दो सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। न्यायालय संभवतः एक “AI Governance Framework” तैयार करने पर विचार करेगा, जिसमें यह तय किया जाएगा कि न्यायिक क्षेत्र में एआई टूल्स का उपयोग किन सीमाओं में किया जा सकता है और उनके नैतिक मानदंड क्या होंगे।
वहीं विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ तकनीक का नहीं, बल्कि “न्याय के मूल दर्शन” का भी है — क्योंकि जब फैसला देने वाली मशीन होगी, तो इंसानियत की भूमिका कहां बचेगी?













