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धार्मिक शिक्षा संस्थानों का पंजीकरण: 14 साल तक के बच्चों को पढ़ाने वाले सभी केंद्रों पर अनिवार्यता की मांग, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

On: February 9, 2026
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धार्मिक शिक्षा संस्थानों का पंजीकरण-सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
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नई दिल्ली, 09 फरवरी 2026। 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा—चाहे वह पंथ निरपेक्ष हो या धार्मिक—देने वाले सभी संस्थानों के अनिवार्य पंजीकरण की मांग को लेकर Supreme Court of India में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में केंद्र और सभी राज्यों को पक्षकार बनाते हुए अदालत से आग्रह किया गया है कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठाने के निर्देश दें। इस महत्वपूर्ण मामले पर सोमवार को सुनवाई प्रस्तावित है।

याचिका का तर्क है कि 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार केवल स्कूलों तक सीमित न रहे, बल्कि जहां भी व्यवस्थित रूप से शिक्षा या धार्मिक शिक्षा दी जा रही है, वहां पंजीकरण, निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित हो।

किन संवैधानिक प्रावधानों का दिया गया हवाला

याचिका में भारतीय संविधान के कई अनुच्छेदों की “भावना” का उल्लेख किया गया है:

  • अनुच्छेद 21A: 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार
  • अनुच्छेद 39(फ): बच्चों के स्वस्थ, गरिमामय विकास और शोषण से सुरक्षा की राज्य की जिम्मेदारी
  • अनुच्छेद 45: प्रारंभिक बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा की दिशा में राज्य का प्रयास
  • अनुच्छेद 51A(क): नागरिकों का मूल कर्तव्य, संविधान के आदर्शों का पालन

याचिका का कहना है कि इन प्रावधानों की रोशनी में, शिक्षा देने वाले हर संस्थान—चाहे उसका स्वरूप धार्मिक हो या सामान्य—को औपचारिक ढांचे में लाना आवश्यक है।

याचिकाकर्ता और अन्य प्रमुख मांगें

यह याचिका भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अश्वनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर की गई है। इसमें दो अतिरिक्त मांगें भी उठाई गई हैं:

  1. अदालत यह घोषित करे कि अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित/प्रशासित करने का अधिकार) वस्तुतः अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यवसाय/रोज़गार की स्वतंत्रता) के दायरे का ही एक विशिष्ट रूप है, और यह उससे परे कोई अतिरिक्त विशेषाधिकार प्रदान नहीं करता।
  2. यदि कोई संस्थान किसी धर्म के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से धार्मिक शिक्षा देता है, तो वह अनुच्छेद 26(a) (धार्मिक संस्थान स्थापित/प्रबंधित करने का अधिकार) के अंतर्गत आए, न कि अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत।

बहस का व्यापक संदर्भ

याचिका मूलतः बाल अधिकार, शैक्षणिक मानक, और संवैधानिक संतुलन के प्रश्नों को एक साथ सामने रखती है। तर्क यह है कि पंजीकरण से:

  • बच्चों की सुरक्षा और शैक्षणिक गुणवत्ता पर निगरानी बढ़ेगी
  • संस्थानों की जवाबदेही तय होगी
  • शिक्षा के अधिकार की भावना का व्यापक अनुपालन सुनिश्चित होगा

वहीं, इस विषय में धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकार और शैक्षणिक स्वायत्तता जैसे पहलुओं पर भी संवैधानिक विमर्श की संभावना है।

अदालत की सुनवाई पर नजर

मामला अब Supreme Court of India के विचाराधीन है। सोमवार की सुनवाई में अदालत यह देखेगी कि क्या इस मांग पर केंद्र और राज्यों से जवाब तलब किया जाए और आगे की रूपरेखा क्या हो।

यह याचिका शिक्षा, धर्म और संविधान के जटिल संगम पर खड़ी है—जहां अदालत की टिप्पणियां भविष्य की नीतिगत दिशा तय कर सकती हैं।

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