नई दिल्ली/16 जुलाई 2026: भारत में तेजी से बढ़ रही डिजिटल बैंकिंग के बीच ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा अब और मजबूत होने जा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों, एनबीएफसी, सहकारी बैंकों और अन्य विनियमित वित्तीय संस्थानों के लिए RBI डेटा गवर्नेंस गाइडलाइंस का मसौदा (Draft Guidelines) जारी किया है। इसका उद्देश्य सिर्फ डेटा का बेहतर प्रबंधन करना नहीं, बल्कि ग्राहकों की गोपनीयता, डेटा की विश्वसनीयता और पूरे वित्तीय तंत्र में पारदर्शिता बढ़ाना भी है।
नई दिल्ली, 16 जुलाई 2026। डिजिटल लेनदेन के दौर में बैंकिंग सेवाएं जितनी आसान हुई हैं, साइबर जोखिम और डेटा सुरक्षा की चुनौतियां भी उतनी ही बढ़ी हैं। ऐसे समय में आरबीआई का यह कदम वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय करने और ग्राहकों के भरोसे को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। नए मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि ग्राहक का डेटा केवल एक तकनीकी संसाधन नहीं, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है।
हर वित्तीय संस्था को बनाना होगा डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क
ड्राफ्ट के अनुसार प्रत्येक बैंक और वित्तीय संस्था को अपनी जरूरत और आकार के अनुरूप डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क (DGF) तैयार करना होगा। इस ढांचे के तहत बोर्ड स्तर पर निगरानी, स्पष्ट नीतियां, संचालन प्रक्रिया और नियमित ऑडिट की व्यवस्था अनिवार्य होगी, ताकि डेटा प्रबंधन केवल औपचारिकता न रहकर संस्थागत जिम्मेदारी बने।
डेटा प्रबंधन के लिए तय होंगी स्पष्ट जिम्मेदारियां
आरबीआई ने डेटा प्रबंधन को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए तीन प्रमुख भूमिकाएं निर्धारित करने का प्रस्ताव रखा है।
- डेटा ओनर डेटा की गुणवत्ता और उसकी समग्र जिम्मेदारी संभालेगा।
- डेटा स्टेवर्ड रोजमर्रा के संचालन और तय नियमों के पालन की निगरानी करेगा।
- डेटा कस्टोडियन डेटा की तकनीकी सुरक्षा, एक्सेस कंट्रोल और स्टोरेज का प्रबंधन करेगा।
इस व्यवस्था से यह स्पष्ट रहेगा कि किसी भी डेटा की सुरक्षा और गुणवत्ता के लिए कौन जिम्मेदार है।
‘सिंगल सोर्स ऑफ ट्रुथ’ से घटेंगी डेटा संबंधी गलतियां
ड्राफ्ट में सिंगल सोर्स ऑफ ट्रुथ (SSOT) की अवधारणा को भी शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि किसी ग्राहक के अकाउंट, केवाईसी या लेनदेन जैसी जानकारी का केवल एक अधिकृत स्रोत होगा। इससे अलग-अलग सिस्टम में मौजूद डेटा के बीच असमानता कम होगी और लोन, क्रेडिट कार्ड, केवाईसी अपडेट तथा अन्य बैंकिंग सेवाओं में त्रुटियों की संभावना घटेगी।
इसके अलावा डेटा का पूरा लाइफ साइकिल मैनेजमेंट सुनिश्चित किया जाएगा। यानी डेटा के संग्रह, उपयोग, साझा करने, सुरक्षित भंडारण और अंततः सुरक्षित निस्तारण तक हर चरण की निगरानी की जाएगी।
डेटा की गुणवत्ता और संवेदनशीलता पर भी रहेगा फोकस
नई गाइडलाइंस में डेटा की क्वालिटी, क्लासिफिकेशन और लाइनेज को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इससे यह रिकॉर्ड रहेगा कि डेटा कितना संवेदनशील है, उसकी उत्पत्ति कहां से हुई और समय के साथ उसमें क्या बदलाव किए गए। इससे किसी भी अनियमितता का पता लगाना पहले की तुलना में अधिक आसान होगा।
थर्ड पार्टी के साथ डेटा साझा करने पर होगी कड़ी निगरानी
आरबीआई ने बाहरी कंपनियों के साथ ग्राहकों का डेटा साझा करने के नियम भी सख्त करने का प्रस्ताव रखा है। किसी भी थर्ड पार्टी को डेटा उपलब्ध कराने के लिए तय प्रक्रियाओं और सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा।
साथ ही सभी विनियमित संस्थानों को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) Act, 2023 के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करना होगा। यह कानून अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला है और इसका उद्देश्य नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा को और मजबूत बनाना है।
आम बैंक ग्राहकों को क्या होगा फायदा?
RBI डेटा गवर्नेंस गाइडलाइंस लागू होने के बाद इसका सबसे बड़ा लाभ आम बैंक ग्राहकों को मिलेगा।
- बैंक खातों, मोबाइल नंबर, पते, केवाईसी और लेनदेन जैसी व्यक्तिगत जानकारी पहले से अधिक सुरक्षित रहेगी।
- डेटा लीक और अनधिकृत उपयोग का जोखिम कम होगा।
- लोन स्वीकृति, क्रेडिट कार्ड, अकाउंट स्टेटमेंट और केवाईसी अपडेट जैसी सेवाओं में त्रुटियां घटेंगी।
- डिजिटल बैंकिंग सेवाएं अधिक भरोसेमंद और तेज बनेंगी।
- ग्राहकों की स्पष्ट सहमति के बिना उनका डेटा साझा करना आसान नहीं होगा।
- बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, जिससे डिजिटल सेवाओं पर लोगों का भरोसा और मजबूत होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल बैंकिंग के तेजी से विस्तार के बीच डेटा सुरक्षा अब केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं, बल्कि वित्तीय स्थिरता और ग्राहक विश्वास का आधार बन चुकी है। ऐसे में आरबीआई की यह पहल भविष्य की सुरक्षित और जवाबदेह बैंकिंग व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।












