लखनऊ/22 जुलाई 2026। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण और वनवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में नेचुरल बायो-इकोनॉमी मॉडल प्रभावी पहल के रूप में उभर रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों को मूल्यवर्धित उत्पादों में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है। इसका परिणाम यह है कि जंगलों से जुड़ी वनवासी महिलाएं अब केवल परंपरागत आजीविका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपने उत्पादों के जरिए बाजार में नई पहचान भी बना रही हैं।
उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं बकरी के दूध, नीम, एलोवेरा, हल्दी, चंदन और मोरिंगा जैसे प्राकृतिक तत्वों का उपयोग कर हर्बल साबुन तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे महिलाओं की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
सोनभद्र का बजरंगबली स्वयं सहायता समूह बना प्रेरणादायक उदाहरण
नेचुरल बायो-इकोनॉमी मॉडल की सफलता का प्रमुख उदाहरण सोनभद्र जिले के रॉबर्ट्सगंज विकास खंड के ग्राम साजौर में संचालित बजरंगबली स्वयं सहायता समूह है। इस समूह से जुड़ी 10 से अधिक वनवासी महिलाएं बकरी के दूध और विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों से प्राकृतिक हर्बल साबुन तैयार कर रही हैं।
समूह के उत्पाद स्थानीय बाजारों के साथ अन्य क्षेत्रों तक भी पहुंच रहे हैं, जिससे महिलाओं को नियमित आय का स्रोत मिला है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार समूह हर महीने लगभग 50 हजार से 60 हजार रुपये का कारोबार कर रहा है।
हर सदस्य की आय में हुआ इजाफा
हर्बल साबुन निर्माण से समूह की प्रत्येक महिला सदस्य को प्रतिमाह लगभग 8 हजार से 10 हजार रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। इस आय का उपयोग महिलाएं अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार की अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने में कर रही हैं। इससे उनके जीवन स्तर में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के ऐसे मॉडल महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा के साथ सामाजिक सम्मान भी प्रदान कर रहे हैं।
प्राकृतिक और कैमिकल फ्री उत्पादों की बढ़ रही मांग
समूह द्वारा तैयार किए जा रहे साबुनों में बकरी के दूध के साथ नीम, एलोवेरा, हल्दी, चंदन और मोरिंगा जैसे प्राकृतिक तत्वों का मिश्रण किया जाता है। ये उत्पाद कैमिकल फ्री होने के कारण त्वचा के लिए सुरक्षित माने जाते हैं।
स्वास्थ्य और प्राकृतिक जीवनशैली के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते ऐसे हर्बल उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि इन साबुनों को स्थानीय बाजारों के अलावा दूसरे जिलों से भी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।
प्रशिक्षण से लेकर मार्केटिंग तक सरकार का सहयोग
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूहों को केवल उत्पाद निर्माण का प्रशिक्षण ही नहीं दिया जा रहा, बल्कि वैज्ञानिक प्रोसेसिंग, आकर्षक पैकेजिंग और प्रभावी विपणन की भी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। इससे उत्पादों की गुणवत्ता और बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा दोनों मजबूत हो रही हैं।
सरकार का उद्देश्य स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम मूल्य संवर्धन कर गांवों में ही रोजगार के अवसर विकसित करना है, ताकि ग्रामीणों को रोजगार के लिए पलायन न करना पड़े और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सके।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही नई दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि नेचुरल बायो-इकोनॉमी मॉडल केवल महिलाओं की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण विकास, स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग और सतत आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दे रहा है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से तैयार हो रहे ऐसे उत्पाद ग्रामीण उद्यमिता को नई पहचान दे रहे हैं और उत्तर प्रदेश में आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।











