लखनऊ/14 सितंबर 2026: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गणेश चतुर्थी और 17 सितंबर को मनाई जाने वाली भगवान विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए स्थानीय उत्पादों और हुनर को बढ़ावा देने की अपील की है। ‘योगी की पाती’ के माध्यम से मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘वोकल फॉर लोकल’ को केवल विचार तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए।
मुख्यमंत्री ने गणेश चतुर्थी को सामाजिक एकता और राष्ट्र के प्रति संकल्प को मजबूत करने वाला पर्व बताया। उन्होंने भगवान गणेश के स्वरूप और उनके जीवन-दर्शन को प्रकृति संरक्षण से जोड़ते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में आस्था के साथ पर्यावरण और जीव-जगत के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी निहित है।
‘वोकल फॉर लोकल’ से कारीगरों और युवाओं को मिलेगा संबल
प्रदेशवासियों को संबोधित अपनी पाती में सीएम योगी ने कहा कि स्थानीय उत्पादों का सम्मान बढ़ने से इसका सीधा लाभ उन कारीगरों और शिल्पकारों तक पहुंचेगा, जिनके हुनर से गांवों और कस्बों की अर्थव्यवस्था चलती है। स्थानीय उत्पाद खरीदने और उन्हें प्रोत्साहित करने से कारीगरों को काम, युवाओं को रोजगार और प्रदेश की अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर और विकसित उत्तर प्रदेश की बुनियाद केवल बड़े प्रोजेक्ट और आधुनिक इमारतें नहीं हैं। किसी प्रदेश की असली ताकत उसके लोगों के कौशल, विचारों, श्रम और उद्यमिता में होती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इसी सोच के साथ प्रदेश सरकार पारंपरिक कारीगरों, शिल्पकारों, युवाओं और उद्यमियों को कौशल, उपकरण, वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
इन योजनाओं से कौशल और रोजगार को बढ़ावा
मुख्यमंत्री ने प्रदेश में संचालित विभिन्न योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना, एक जनपद-एक उत्पाद (ओडीओपी), उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन और मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान के माध्यम से स्थानीय हुनर को आर्थिक अवसरों से जोड़ने का काम किया जा रहा है।
इन पहलों का उद्देश्य पारंपरिक कौशल को आधुनिक बाजार की जरूरतों से जोड़ना और युवाओं को रोजगार तलाशने वाले से रोजगार देने वाला बनाने की दिशा में आगे बढ़ाना है।
गणेश चतुर्थी में छिपा है प्रकृति संरक्षण का संदेश
मुख्यमंत्री योगी ने भगवान गणेश को शुभत्व और मंगल का आराध्य बताते हुए कहा कि युवाओं द्वारा घरों में गणपति की स्थापना और श्रद्धा के साथ पूजन की परंपरा सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करती है। उन्होंने गणेश चतुर्थी को सामाजिक एकता और राष्ट्र के प्रति संकल्प को सुदृढ़ करने वाला महापर्व बताया।
उन्होंने भगवान गणेश के स्वरूप को प्रकृति और जीव-जगत से जोड़कर इसकी व्याख्या की। सीएम के अनुसार, गणेश जी का गजमुख वन और वन्यजीवन का प्रतीक माना जा सकता है, जबकि उनका मूषक वाहन भूमि की उर्वरता और कृषि से जुड़ा संदेश देता है। उनका विशाल उदर संपूर्ण ब्रह्मांड को समाहित करने का भाव प्रकट करता है और बड़े कान प्रकृति की हर पुकार सुनने की प्रेरणा देते हैं।
मुख्यमंत्री ने गणेश चतुर्थी पर पूजे जाने वाले ‘एकविंशति पत्र’ यानी 21 प्रकार की विशेष पत्तियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे औषधीय पौधों के संरक्षण की परंपरा से जोड़ा और कहा कि गणपति का चरित्र मानव जीवन तथा प्रकृति के परस्पर पूरक होने का संदेश देता है।
लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को जनजागरण से जोड़ा
मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को आस्था से सामाजिक एकता और सामाजिक एकता से जनशक्ति तथा राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा देने वाला पर्व बनाया। यही वजह है कि गणेशोत्सव धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक चेतना का भी माध्यम बना।
उन्होंने कहा कि गणेशोत्सव से जुड़ी ज्ञान, विवेक और कर्म की भावना सृजन और निर्माण के प्रतीक भगवान विश्वकर्मा के पूजन में भी दिखाई देती है।
विश्वकर्मा जयंती पर विकसित उत्तर प्रदेश के निर्माण का संकल्प
मुख्यमंत्री ने कहा कि 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा की जयंती मनाई जाएगी। भारतीय परंपरा में उन्हें सृष्टि का प्रथम अभियंता माना जाता है। इस अवसर पर कौशल और तकनीक के संगम से विकसित उत्तर प्रदेश के निर्माण का संकल्प और मजबूत होगा।
उन्होंने कहा कि प्रदेश में बन रहे एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, औद्योगिक क्षेत्र और आधुनिक आधारभूत ढांचे उत्तर प्रदेश की बदलती तस्वीर और बढ़ते सामर्थ्य को दर्शाते हैं। लेकिन किसी प्रदेश का वास्तविक निर्माण केवल बड़े ढांचों से नहीं होता। उसके पीछे लोगों का हुनर, नई सोच और उद्यम करने का साहस भी उतना ही जरूरी है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, स्थानीय सामर्थ्य पर भरोसा और हुनर को अवसर देना आत्मनिर्भर एवं विकसित उत्तर प्रदेश की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता तैयार करेगा।
उन्होंने प्रदेशवासियों से अपील की कि इस बार पर्वों की आस्था के साथ स्थानीय कारीगरों और उत्पादों के प्रति जिम्मेदारी को भी जोड़ा जाए। बाजार में स्थानीय वस्तुओं की मांग बढ़ेगी तो उसका असर उन परिवारों तक पहुंचेगा, जिनकी रोजी-रोटी पीढ़ियों से अपने हुनर पर टिकी हुई है।









