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महिला आरक्षण पर विधानसभा में CM योगी का हमला, बोले- सपा-कांग्रेस हमेशा से महिला विरोधी

On: April 30, 2026
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महिला आरक्षण पर विधानसभा में CM योगी का हमला
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लखनऊ, 30 अप्रैल 2026 (गुरुवार)। उत्तर प्रदेश विधानसभा का विशेष सत्र गुरुवार को महिला आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक तापमान बढ़ाता नजर आया। सदन के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हुई, वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें “महिला विरोधी राजनीति” का प्रतीक बताया।

करीब आधे घंटे से अधिक चले अपने भाषण में मुख्यमंत्री का स्वर कहीं तथ्यात्मक था तो कहीं बेहद व्यंग्यात्मक। उन्होंने कहा कि “आधी आबादी के आक्रोश ने विपक्ष को मजबूर किया है कि वह अपना रुख बदले, लेकिन इनका इतिहास कुछ और ही कहानी कहता है।” सदन में उनके इस बयान के दौरान विपक्षी सदस्यों ने जोरदार विरोध भी दर्ज कराया।

“सपा को देखकर गिरगिट भी सहम जाए” — योगी का तंज

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि उसका राजनीतिक व्यवहार लगातार बदलता रहा है। उन्होंने कहा, “सपा को देखकर गिरगिट भी सहम जाए… ये नेता बार-बार रंग बदलते हैं।”

यह टिप्पणी केवल एक राजनीतिक आरोप नहीं थी, बल्कि उन्होंने इसे महिला आरक्षण जैसे गंभीर मुद्दे पर विपक्ष के “दोहरे चरित्र” (double standards – दोहरा रवैया) से जोड़ा।

उन्होंने आरोप लगाया कि सपा और कांग्रेस ने हमेशा महिलाओं से जुड़ी योजनाओं का विरोध किया है—चाहे वह बैंक खाते खोलने की पहल हो या अन्य कल्याणकारी योजनाएं।

प्रधानमंत्री मोदी की योजनाओं का जिक्र

मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में नरेंद्र मोदी की नीतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश आज उनके प्रयासों के लिए आभारी है।

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत करोड़ों गरीबों, खासकर महिलाओं के बैंक खाते खोले गए। उनके अनुसार, लगभग 30 करोड़ महिलाओं को इससे सीधा लाभ मिला और अब सरकारी योजनाओं की राशि सीधे उनके खातों में पहुंचती है—जिससे पारदर्शिता (transparency – पारदर्शिता) और सशक्तीकरण दोनों बढ़े हैं।

योगी ने यह भी कहा कि पहले की सरकारों में योजनाओं का लाभ “बीच में ही अटक जाता था”, लेकिन अब महिलाएं आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर बन रही हैं।

“सत्र आधी आबादी को समर्पित” — महिला सशक्तीकरण पर जोर

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह विशेष सत्र केवल राजनीतिक बहस का मंच नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान और अधिकारों को मजबूत करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण का उद्देश्य केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना है।

उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह इस महत्वपूर्ण विषय पर भी राजनीति कर रहा है और सत्र में बाधा डालने की कोशिश कर रहा है।

पुराने मामलों का जिक्र, विपक्ष पर नैतिक सवाल

अपने भाषण में मुख्यमंत्री ने 1995 के लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड का उल्लेख करते हुए समाजवादी पार्टी पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उस घटना ने महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाई थी और उस समय विपक्ष का रवैया बेहद निराशाजनक था।

इसी तरह 2014 के बदायूं कांड समेत कई घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सपा शासनकाल में महिला सुरक्षा एक बड़ी चुनौती थी। उन्होंने कहा, “आधी आबादी के सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं होगा।”

शाह बानो और तीन तलाक का संदर्भ

मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए शाह बानो प्रकरण का जिक्र किया और कहा कि उस समय एक महिला को न्याय नहीं मिल पाया क्योंकि कांग्रेस “दबाव में झुक गई थी।”

उन्होंने तीन तलाक कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि विपक्ष ने इस कुप्रथा (regressive practice – कुप्रथा) का भी समर्थन किया था, जबकि केंद्र सरकार ने इसे खत्म कर महिलाओं को अधिकार दिलाने का प्रयास किया।

सपा का पलटवार: “सरकार कर रही दुष्प्रचार”

वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने भी सत्ता पक्ष के आरोपों को खारिज किया। अखिलेश यादव की मौजूदगी में हुई बैठक में सपा ने “अति निंदा प्रस्ताव” पारित कर भाजपा पर महिला आरक्षण को लेकर “झूठ फैलाने” का आरोप लगाया।

सपा का कहना है कि महिला आरक्षण कानून पहले ही पारित हो चुका है और सरकार चाहे तो इसे लागू कर सकती है। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा इस मुद्दे का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए कर रही है, जबकि वास्तविक सशक्तीकरण के सवालों पर स्पष्ट नीति नहीं है।

सदन से बाहर भी जारी रही राजनीतिक गर्मी

विधानसभा के भीतर की बहस का असर बाहर भी साफ दिखाई दिया। दोनों पक्षों के नेता मीडिया के सामने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे।

एक तरफ सत्ता पक्ष महिला आरक्षण को सामाजिक बदलाव का माध्यम बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे “राजनीतिक एजेंडा” करार दे रहा है।

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश विधानसभा का यह विशेष सत्र एक बार फिर यह दिखाता है कि महिला आरक्षण केवल एक विधायी मुद्दा नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक अर्थों से जुड़ा विषय है।

सत्ता और विपक्ष के बीच जारी यह टकराव आने वाले समय में और तेज हो सकता है। लेकिन इस पूरे विमर्श के केंद्र में एक ही सवाल है—क्या यह बहस वास्तव में महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में ठोस बदलाव ला पाएगी, या फिर यह मुद्दा भी राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा?

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