नई दिल्ली (Thu, 07 May 2026)। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका का बहुचर्चित “प्रोजेक्ट फ्रीडम” शुरुआत के महज दो दिन बाद ही ठहर गया। होर्मुज स्ट्रेट में फंसे व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए शुरू किए गए इस अभियान को तब बड़ा झटका लगा, जब सऊदी अरब ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने एयरबेस और एयरस्पेस के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
इस घटनाक्रम ने साफ संकेत दिया है कि खाड़ी देशों का एक बड़ा वर्ग अमेरिका और ईरान के बीच सीधे सैन्य टकराव से दूरी बनाए रखना चाहता है। यही वजह है कि क्षेत्रीय सहयोग के बिना अमेरिकी रणनीति कमजोर पड़ती दिखाई दी।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर अभियान को अस्थायी रूप से रोकने की पुष्टि करते हुए कहा कि यह फैसला पाकिस्तान समेत कुछ अन्य देशों के अनुरोध के बाद लिया गया। हालांकि अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स इस फैसले के पीछे सऊदी अरब के रुख को सबसे बड़ा कारण बता रही हैं।
सऊदी एयरबेस न मिलने से फंसी अमेरिकी रणनीति
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप प्रशासन होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों को सैन्य सुरक्षा देने की योजना पर काम कर रहा था। इसके तहत अमेरिकी लड़ाकू विमानों और नौसैनिक संसाधनों की तैनाती प्रस्तावित थी।
लेकिन मामला उस समय उलझ गया जब Saudi Arabia ने रियाद के दक्षिण-पूर्व में स्थित प्रिंस सुल्तान एयरबेस के उपयोग की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, अमेरिकी विमानों को सऊदी एयरस्पेस से उड़ान भरने की मंजूरी भी नहीं मिली।
बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस Mohammed bin Salman से फोन पर बातचीत की थी, लेकिन दोनों पक्ष किसी सहमति तक नहीं पहुंच सके। हालांकि सऊदी अधिकारियों ने सार्वजनिक तौर पर अमेरिकी योजना से नाराजगी की बात स्वीकार नहीं की।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला केवल सैन्य नहीं बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक संदेश भी है। खाड़ी देश फिलहाल क्षेत्र में खुली सैन्य भिड़ंत से बचना चाहते हैं, क्योंकि इसका सीधा असर तेल व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है।
अमेरिका का दावा, लेकिन सहयोगियों की अलग तस्वीर
अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी सेंटकॉम का दावा है कि “प्रोजेक्ट फ्रीडम” के शुरुआती दो दिनों में तीन जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित निकाला गया। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने यह भी कहा कि अमेरिका ने इस अभियान की जानकारी अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को पहले ही दे दी थी।
हालांकि पश्चिम एशिया के एक वरिष्ठ राजनयिक ने अमेरिकी दावों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अमेरिकी मीडिया से बातचीत में कहा कि अमेरिका ने पहले “प्रोजेक्ट फ्रीडम” की सार्वजनिक घोषणा कर दी और बाद में सहयोगी देशों से समन्वय शुरू किया।
राजनयिक के मुताबिक, “पहले घोषणा की गई, फिर हमसे संपर्क किया गया। ऐसे संवेदनशील क्षेत्रीय हालात में यह तरीका सहयोग बढ़ाने के बजाय असहजता पैदा करता है।”
इस बयान ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के बीच रणनीतिक तालमेल पहले जैसा मजबूत नहीं रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ी वैश्विक चिंता
Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर असर डाल सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यही कारण है कि खाड़ी देशों की प्राथमिकता फिलहाल सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि कूटनीतिक समाधान पर दिखाई दे रही है।
ईरान ने व्यापारिक जहाजों को सहायता देने की पेशकश की
दूसरी तरफ Iran ने भी होर्मुज क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। ईरान के बंदरगाह एवं समुद्री संगठन ने घोषणा की है कि वह होर्मुज और आसपास के समुद्री क्षेत्र में चल रहे व्यापारिक जहाजों को तकनीकी, समुद्री और चिकित्सीय सहायता देने के लिए तैयार है।
ईरानी अधिकारियों के अनुसार, जहाजों को सहायता के लिए निकटतम ईरानी बंदरगाह के वेसल ट्रैफिक सर्विस (VTS) केंद्र से संपर्क करना होगा। सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के मुताबिक यह संदेश औपचारिक समुद्री संचार माध्यमों के जरिए जहाजों के कप्तानों तक पहुंचाया जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान इस कदम के जरिए खुद को क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने वाले जिम्मेदार पक्ष के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, जबकि अमेरिका सैन्य दबाव की रणनीति पर चलता दिखाई दे रहा है।
पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों का संकेत
“प्रोजेक्ट फ्रीडम” का इतनी जल्दी रुक जाना केवल एक सैन्य अभियान की विफलता नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति का संकेत भी माना जा रहा है।
खाड़ी देशों की सतर्क दूरी यह दर्शाती है कि वे अब खुलकर किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय संतुलित कूटनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं। आने वाले दिनों में अमेरिका, ईरान और अरब देशों के बीच यह शक्ति संतुलन वैश्विक राजनीति की दिशा तय कर सकता है।













