नई दिल्ली/07 नवंबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देना अपने आप में न तो सजा है और न ही इससे उसकी प्रतिष्ठा पर कोई दाग लगता है। अदालत के मुताबिक, ऐसा फैसला कर्मचारी के समग्र सेवा रिकॉर्ड और जनहित के आकलन के आधार पर लिया जाता है। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पांच कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट अनिवार्य सेवानिवृत्ति: कर्मचारी को दोषी मानने का आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2026 को चतुर सिंह ध्रुव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश कर्मचारी के आचरण पर कोई आरोप नहीं लगाता। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि कर्मचारी को किसी कदाचार का दोषी पाया गया है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का उद्देश्य किसी कर्मचारी को दंडित करना नहीं, बल्कि प्रशासनिक दक्षता बनाए रखना और जनहित की रक्षा करना है। सक्षम अधिकारी इस बात का आकलन कर सकता है कि किसी कर्मचारी को सेवा में बनाए रखना अब प्रशासन के हित में है या नहीं।
हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि ऐसा निर्णय मनमानी या केवल अटकलों के आधार पर नहीं लिया जा सकता। इसके लिए संबंधित कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड में ठोस और प्रासंगिक सामग्री मौजूद होना जरूरी है।
प्रशासनिक दक्षता के लिए अनिवार्य सेवानिवृत्ति का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी अधिकारी की कार्यक्षमता, उपयोगिता और सेवा में बने रहने की उपयुक्तता का अंतिम आकलन कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होता है। न्यायालय यह देख सकता है कि निर्णय लेने वाले सक्षम अधिकारी के सामने प्रासंगिक सामग्री थी या नहीं और उस पर उचित विचार किया गया या नहीं।
यदि फैसला बिना किसी साक्ष्य के लिया गया हो, उसमें मनमानी हो, अधिकारी ने अपना दिमाग न लगाया हो या निर्णय दुर्भावना से प्रभावित हो, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। लेकिन न्यायालय प्रशासनिक निर्णय के स्थान पर अपना आकलन नहीं थोप सकता।
समान सेवा रिकॉर्ड वाले कर्मचारी को नहीं मिली राहत
इस मामले में कर्मचारियों की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि समान परिस्थितियों में कुछ अन्य कर्मचारियों को सेवा में बनाए रखा गया, जबकि उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि किसी अन्य कर्मचारी को सेवा में बनाए रखने के आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को अपने आप भेदभावपूर्ण नहीं कहा जा सकता।
पीठ के मुताबिक, प्रत्येक कर्मचारी की कार्यकुशलता, ईमानदारी, उपयोगिता और पूरे सेवा रिकॉर्ड का व्यक्तिगत मूल्यांकन किया जाता है। इसलिए केवल यह तथ्य कि समान स्थिति वाले किसी दूसरे कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, आदेश को असंवैधानिक ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है।
छत्तीसगढ़ सरकार के पांच कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति बरकरार
मामले में छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2017 के एक परिपत्र के तहत कर्मचारियों के सेवा रिकॉर्ड की समीक्षा कराई थी। स्क्रीनिंग कमेटी ने कुल 14 कर्मचारियों के रिकॉर्ड का आकलन किया।
जांच के बाद पांच कर्मचारियों को निर्धारित मानकों से नीचे पाया गया। उनके समग्र सेवा रिकॉर्ड और हालिया गोपनीय रिपोर्टों में असंतोषजनक प्रदर्शन, कार्यकुशलता में गिरावट या सरकारी सेवा में उपयोगिता कम होने के संकेत मिले थे। वहीं, शेष नौ कर्मचारियों को निर्धारित मानकों पर खरा उतरने के बाद सेवा में बनाए रखने योग्य पाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कमेटी ने सभी कर्मचारियों पर समान मानदंड लागू किए थे और निर्णय प्रासंगिक सामग्री के आधार पर लिया गया था।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का फैसला भी बरकरार
इस मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 12 अप्रैल 2023 को राज्य सरकार के फैसले को बरकरार रखा था। हाई कोर्ट ने पहले दिए गए एकल पीठ के आदेश को सही ठहराया था, जिसमें वर्ष 2017 के सरकारी परिपत्र के तहत की गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति में हस्तक्षेप से इनकार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही मानते हुए संबंधित अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर लिया गया निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के विरुद्ध नहीं पाया गया।
इस फैसले से एक बार फिर स्पष्ट हुआ है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का उद्देश्य कर्मचारी को दंडित करना नहीं, बल्कि जनहित और प्रशासनिक दक्षता को प्राथमिकता देना है। हालांकि, ऐसे फैसलों में पारदर्शिता और ठोस सेवा रिकॉर्ड का होना अनिवार्य है।













