नई दिल्ली/30 अक्टूबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों की लाइव-स्ट्रीमिंग के वीडियो के अनधिकृत इस्तेमाल, प्रसारण और व्यावसायिक दोहन को लेकर सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह इस संबंध में तैयार किए जा रहे नीतिगत ढांचे में ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई के स्पष्ट प्रावधान शामिल करे, जो अदालती कार्यवाही के वीडियो का गलत इस्तेमाल करते हैं या पहले से जारी प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हैं।
शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि लाइव-स्ट्रीमिंग की सामग्री के दुरुपयोग को रोकने के लिए केवल दिशानिर्देश बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके उल्लंघन पर कार्रवाई की व्यवस्था भी जरूरी है।
Supreme Court के निर्देश: लाइव स्ट्रीमिंग वीडियो के दुरुपयोग पर होगी कार्रवाई
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए बताया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों और अन्य संबंधित पक्षों से इस विषय पर सुझाव प्राप्त हुए हैं। इन सुझावों को व्यापक नीतिगत दिशानिर्देश तैयार करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को भेजा गया है।
उन्होंने अदालत को बताया कि मंत्रालय इन सुझावों पर विचार करेगा और कुछ दिनों में अपनी प्रतिक्रिया देगा। इसके साथ ही उन्होंने मामले की अगली सुनवाई दीपावली की छुट्टियों के बाद रखने का अनुरोध किया।
सुनवाई के दौरान मेहता ने पहले जारी अंतरिम आदेशों के उल्लंघन का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि प्रतिबंधों का उल्लंघन करके इंटरनेट पर अपलोड की गई सामग्री को हटाने के संबंध में भी निर्देश दिए जाएं।
इस पर पीठ ने कहा कि प्रस्तावित नीतिगत व्यवस्था में निर्देशों का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई के प्रावधान भी शामिल किए जाएंगे।
24 जुलाई के अंतरिम आदेश में क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने?
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 24 जुलाई 2026 को अदालती कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल को लेकर अंतरिम निर्देश जारी किए थे। इसके तहत अदालत की पूर्व अनुमति के बिना न्यायिक कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निकालने, साझा करने, अपलोड करने, दोबारा पोस्ट करने, उसमें बदलाव करने, संग्रहित करने या उसका मुद्रीकरण करने पर रोक लगाई गई थी।
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के महासचिव या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति आवश्यक बताई गई थी।
बाद में 18 सितंबर को अदालत ने स्पष्ट किया था कि इन निर्देशों का मतलब मान्यता प्राप्त समाचार संगठनों की अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग पर रोक लगाना नहीं है। मीडिया संस्थान अदालत की सुनवाई और कानूनी घटनाक्रम पर खबरें प्रकाशित कर सकते हैं, लेकिन बिना अनुमति सुनवाई के ऑडियो-वीडियो क्लिप का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
प्रशांत भूषण ने दिया डिजिटल वॉटरमार्क और सत्यापन का सुझाव
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने एक महत्वपूर्ण सुझाव रखा। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी प्रत्येक आधिकारिक वीडियो क्लिप पर सत्यापन योग्य डिजिटल हस्ताक्षर या वॉटरमार्क होना चाहिए।
इससे आम लोगों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को असली वीडियो तथा उसके साथ छेड़छाड़ करके तैयार की गई सामग्री के बीच अंतर समझने में आसानी होगी।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अदालत की सभी कार्यवाहियों के प्रमाणित वीडियो सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध कराए जाएं। इससे किसी भी व्यक्ति को मूल फुटेज की प्रामाणिकता जांचने का अवसर मिल सकेगा।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने संकेत दिया कि इस दिशा में प्रशासनिक स्तर पर कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा कि वीडियो के किसी हिस्से को निकालने और उसके इस्तेमाल के उद्देश्य पर न्यायिक निगरानी जरूरी है।
यूट्यूब और सोशल मीडिया पर वीडियो इस्तेमाल करने वालों के लिए क्या है नियम?
अदालत में सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि यदि कोई यूट्यूबर या डिजिटल कंटेंट क्रिएटर किसी मुकदमे की जानकारी देने के लिए आधिकारिक वेबसाइट से अदालती कार्यवाही की वीडियो क्लिप इस्तेमाल करना चाहता है, तो क्या उसे भी अनुमति लेनी होगी?
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के महासचिव से अनुमति लेनी होगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत को यह देखना होगा कि वीडियो का कितना हिस्सा इस्तेमाल किया जा रहा है और उसका उद्देश्य क्या है।
प्रशांत भूषण ने इस व्यवस्था से पत्रकारिता और खुले न्याय की अवधारणा से जुड़े सवाल उठाए। उनका तर्क था कि आधिकारिक वीडियो से समाचार रिपोर्ट तैयार करने वाले लोगों के लिए पूर्व अनुमति की अनिवार्यता व्यावहारिक परेशानी पैदा कर सकती है।
हालांकि, पीठ ने इस विषय पर अंतिम फैसला देने के बजाय कहा कि संबंधित समस्या सामने आने पर उस पर विचार किया जाएगा।
दीपावली के बाद होगी मामले की अगली सुनवाई
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि मामले को दीपावली की छुट्टियों के बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार को विभिन्न हाई कोर्टों, अधिवक्ताओं और अन्य हितधारकों से सुझाव मिले हैं, जिनके आधार पर व्यापक नीतिगत प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है।
पीठ ने अपने आदेश में 9 अक्टूबर 2026 को जारी निर्देशों का भी उल्लेख किया और पहले से लागू अंतरिम आदेशों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
अब केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को ऐसी नीति तैयार करनी है, जिसमें वीडियो के अनधिकृत इस्तेमाल, गलत तरीके से प्रसारण और व्यावसायिक दोहन के मामलों में कार्रवाई का प्रावधान भी शामिल हो।
अदालत की चिंता केवल वीडियो के वायरल होने तक सीमित नहीं है। चुनिंदा टिप्पणियों को संदर्भ से अलग करके पेश करना, भ्रामक कैप्शन लगाना और सुनवाई के छोटे-छोटे हिस्सों से गलत संदेश फैलाना भी न्यायिक प्रक्रिया की छवि को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में प्रस्तावित नीति का महत्व इस बात में होगा कि वह अदालत की कार्यवाही की प्रामाणिकता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ समाचार रिपोर्टिंग तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाती है।












