बंगलूरू/16 सितंबर 2026: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टैक्स पॉलिसी को लेकर स्वतंत्र शोध और व्यापक सार्वजनिक चर्चा की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने टैक्स प्रोफेशनल्स से कहा कि कर व्यवस्था पर विचार करते समय केवल किसी खास सेक्टर या क्षेत्र के हित को सामने न रखें, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय हित को भी ध्यान में रखें।
बंगलूरू में बुधवार को आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय टैक्स सम्मेलन में बोलते हुए वित्त मंत्री ने बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, टीडीएस-टीसीएस नियमों में किए गए बदलाव और अंतरराष्ट्रीय कर संधियों से जुड़े भारत के रुख पर भी विस्तार से बात की।
टैक्स पॉलिसी पर व्यापक बहस क्यों जरूरी?
सीतारमण ने कहा कि टैक्स पॉलिसी को लेकर होने वाली बहस केवल सरकार और कर विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्वतंत्र शोध और उसके निष्कर्षों को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि कर व्यवस्था को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ सकें।
उन्होंने टैक्स प्रोफेशनल्स से क्षेत्र या सेक्टर विशेष के हितों से ऊपर उठकर सोचने की अपील की। वित्त मंत्री के मुताबिक, कर नीति पर गंभीर चर्चा में यह देखना जरूरी है कि किसी प्रस्ताव या बदलाव का व्यापक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में टैक्स प्रोफेशनल्स से कहा कि वे “सेक्टर-विशेष की सोच से ऊपर उठें और देश को सबसे पहले रखें।”
यह बात ऐसे समय में सामने आई है, जब कारोबारियों, निवेशकों और कर विशेषज्ञों के लिए कर नियमों में बदलाव लगातार महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं।
TDS और TCS नियमों में किए बदलाव का जिक्र
वित्त मंत्री ने टीडीएस यानी Tax Deducted at Source और टीसीएस यानी Tax Collected at Source से जुड़े प्रावधानों में किए गए बदलावों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि सरकार ने इन नियमों को जान-बूझकर अधिक तर्कसंगत बनाया है। इसके तहत कुछ प्रावधानों की सीमाएं बढ़ाई गई हैं और ऐसे मामलों में अनावश्यक आपराधिक परिणामों को कम किया गया है, जहां नियमों के अनुपालन से जुड़ी कमियां सामने आती हैं।
सरकार की ओर से कर व्यवस्था को सरल और अनुपालन के लिहाज से अधिक व्यावहारिक बनाने की कोशिशों के संदर्भ में वित्त मंत्री ने इन बदलावों को रेखांकित किया।
अंतरराष्ट्रीय टैक्सेशन पर भारत का रुख
अंतरराष्ट्रीय टैक्सेशन की चर्चा करते हुए सीतारमण ने भारत की विभिन्न देशों के साथ टैक्स संधियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत ने मॉरीशस, सिंगापुर और साइप्रस के साथ अपनी टैक्स संधियों पर फिर से बातचीत की है।
उनके अनुसार, इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य कैपिटल गेन्स यानी पूंजीगत लाभ पर सोर्स पर टैक्स लगाने के भारत के अधिकार को वापस हासिल करना था। अंतरराष्ट्रीय निवेश बढ़ने के साथ ऐसे कर समझौते भारत की राजस्व नीति और सीमा-पार निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत के सामने कई चुनौतियां
वित्त मंत्री ने वैश्विक आर्थिक माहौल का जिक्र करते हुए कहा कि विकास और तरक्की की राह में भारत के सामने अपनी चुनौतियां हैं। हालांकि, मुश्किल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कहा कि भारत बेहतर स्थिति में है।
सीतारमण ने टैरिफ से जुड़ी धमकियों, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे तीन युद्धों, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी जटिलताओं तथा कच्चे तेल और फर्टिलाइजर की कीमतों को प्रमुख चुनौतियों में गिनाया।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कच्चा तेल और फर्टिलाइजर भारत के प्रमुख आयातों में शामिल हैं। ऐसे में वैश्विक बाजार में इनकी कीमतों या आपूर्ति से जुड़े बदलाव का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
टैक्स व्यवस्था में संतुलन पर जोर
वित्त मंत्री के संबोधन का एक प्रमुख संदेश यह रहा कि कर व्यवस्था को लेकर होने वाली चर्चा में कारोबार और क्षेत्र विशेष के हितों के साथ व्यापक आर्थिक और राष्ट्रीय हितों को भी जगह मिलनी चाहिए। स्वतंत्र शोध, सार्वजनिक बहस और बदलती वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए टैक्स पॉलिसी पर संवाद आगे बढ़ाने की जरूरत उन्होंने सामने रखी।












