नई दिल्ली, 15 सितंबर 2026। भविष्य के युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और इसमें तकनीक की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन और दूसरी उभरती प्रौद्योगिकियां आने वाले समय में सैन्य क्षमताओं और रणनीतिक बढ़त को नई दिशा दे सकती हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को कहा कि जो तकनीक आज कल्पना का हिस्सा है, वही आने वाले वर्षों में देश की सैन्य क्षमता की नींव बन सकती है।
राजनाथ सिंह नई दिल्ली स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) भवन में आयोजित डीआरडीओ-इंडस्ट्री सिनर्जी मीट ‘विमर्श 2026’ को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने वर्ष 2047 तक भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और रणनीतिक रूप से सुरक्षित बनाने के लक्ष्य में रक्षा क्षेत्र को केंद्रीय भूमिका देने पर जोर दिया।
एआई और ड्रोन बदलेंगे भविष्य के युद्ध का तरीका
रक्षा मंत्री ने कहा कि भविष्य के युद्ध में तकनीकी बढ़त ही रणनीतिक बढ़त तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। खासतौर पर एआई और ड्रोन जैसी तकनीकें सैन्य अभियानों के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव ला सकती हैं।
उन्होंने रक्षा क्षेत्र से नवाचार की रफ्तार बढ़ाने का आह्वान करते हुए कहा कि आज जिस तकनीक की कल्पना की जा रही है, उसे केवल भविष्य की तस्वीर के रूप में देखने के बजाय वर्तमान में विकसित करने की जरूरत है।
राजनाथ सिंह ने एआई की क्षमता का उदाहरण देते हुए कहा कि आज ऐसी तस्वीरें भी बनाई जा सकती हैं, जो देखने में 1980 के दशक की लगें। लेकिन असली उपलब्धि तब होगी, जब भारत आज से 40-50 वर्ष आगे के भविष्य की कल्पना कर उसे तकनीकी रूप देने में सक्षम हो।
2047 तक रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य
रक्षा मंत्री ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक मजबूती तक सीमित नहीं है। भारत को ऐसा देश बनाना है जो तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर, सामाजिक रूप से समावेशी, पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ और रणनीतिक रूप से सुरक्षित हो।
इस लक्ष्य में रक्षा क्षेत्र को उन्होंने एक ‘आधार स्तंभ’ बताया। उनका कहना था कि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता हासिल करना, स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल बढ़ाना और रक्षा निर्यात को कई गुना बढ़ाना जरूरी है। साथ ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका को मजबूत करना भी लक्ष्य का अहम हिस्सा होना चाहिए।
यह बदलाव केवल सरकारी संस्थानों के प्रयास से संभव नहीं होगा। इसके लिए रक्षा उद्योग से जुड़े अलग-अलग पक्षों के बीच बेहतर तालमेल और दीर्घकालिक सहयोग की जरूरत होगी।
डीआरडीओ और उद्योग की साझेदारी उत्पादन से आगे बढ़े
‘विमर्श 2026’ में रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ-उद्योग साझेदारी को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह सहयोग केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अनुसंधान और डिजाइन से लेकर परीक्षण, प्रमाणन और विनिर्माण तक पूरी वैल्यू चेन में दोनों पक्षों के बीच मजबूत साझेदारी होनी चाहिए।
उन्होंने बड़ी रक्षा कंपनियों के साथ-साथ एमएसएमई और स्टार्टअप को भी इस प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाने पर जोर दिया। इसका मकसद देश में रक्षा तकनीक के विकास का ऐसा इकोसिस्टम तैयार करना है, जिसमें छोटी कंपनियों और नई तकनीक पर काम करने वाले स्टार्टअप को भी अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिले।
दरअसल, आधुनिक रक्षा तकनीक का विकास लंबी प्रक्रिया है। किसी नए विचार को सैन्य उपयोग के योग्य बनाने के लिए केवल प्रयोगशाला में शोध पर्याप्त नहीं होता। डिजाइन, परीक्षण, प्रमाणन, उत्पादन और अंततः बड़े पैमाने पर इस्तेमाल—हर चरण में विशेषज्ञता और समन्वय की जरूरत होती है।
‘आज की कल्पना ही कल की सैन्य क्षमता बनेगी’
राजनाथ सिंह ने भविष्य को लेकर दूरदर्शी सोच विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत 40-50 साल बाद खुद को जिस रूप में देखना चाहता है, उसकी कल्पना ही देश के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और उद्योग को नई ऊर्जा दे सकती है।
उनके मुताबिक, जो कंपनियां नई और उभरती प्रौद्योगिकियों में अभी निवेश करेंगी, वही भविष्य में तकनीकी नेतृत्व हासिल करने की स्थिति में होंगी। इसलिए लक्ष्य केवल भविष्य की तकनीक की कल्पना करना नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीक को आज ही विकसित करना होना चाहिए।
युद्ध का मैदान आने वाले वर्षों में केवल सैनिकों, टैंकों और पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं रहेगा। डेटा, स्वायत्त प्रणालियां, ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकें सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन सकती हैं। ऐसे दौर में तकनीकी आत्मनिर्भरता भारत की सुरक्षा के साथ-साथ उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता के लिए भी महत्वपूर्ण होगी।













