लखनऊ (10 मार्च 2026)। उत्तर प्रदेश में अब जमीन, मकान या फ्लैट की रजिस्ट्री पहले जितनी आसान नहीं रहेगी। राज्य सरकार ने संपत्ति पंजीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और फर्जीवाड़े पर अंकुश लगाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में संपत्ति रजिस्ट्री से पहले स्वामित्व जांच को अनिवार्य बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है।
सरकार का मानना है कि जमीन और मकान से जुड़े विवादों का बड़ा कारण गलत तरीके से कराई गई रजिस्ट्री होती है। कई मामलों में असली मालिक की जानकारी के बिना ही संपत्ति बेच दी जाती है या प्रतिबंधित जमीन का भी सौदा कर दिया जाता है। नई व्यवस्था से ऐसे मामलों पर रोक लगाने की कोशिश की गई है।
संपत्ति रजिस्ट्री से पहले स्वामित्व जांच अनिवार्य, उप निबंधक करेंगे दस्तावेजों की पड़ताल
नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी संपत्ति की रजिस्ट्री से पहले उसके स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों की अनिवार्य जांच की जाएगी। संपत्ति रजिस्ट्री से पहले स्वामित्व जांच सुनिश्चित करने के लिए उप निबंधक को स्पष्ट अधिकार दिए जाएंगे।
ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन के स्वामित्व की पुष्टि खतौनी के आधार पर की जाएगी। वहीं शहरी क्षेत्रों में नगर निकायों द्वारा जारी पीले कार्ड और अन्य स्वामित्व दस्तावेजों की जांच के बाद ही रजिस्ट्री प्रक्रिया पूरी होगी।
स्टांप एवं पंजीयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रवीन्द्र जायसवाल ने बताया कि कई बार देखा गया है कि वास्तविक मालिक की जगह कोई अन्य व्यक्ति संपत्ति बेचने के लिए रजिस्ट्री करा देता है। यही नहीं, कुछ मामलों में प्रतिबंधित, कुर्क या सरकारी भूमि की भी रजिस्ट्री कराई जाती रही है, जिसके बाद वर्षों तक मुकदमेबाजी चलती रहती है।
रजिस्ट्रेशन एक्ट में संशोधन कर जोड़ी जाएंगी नई धाराएं
मंत्री ने बताया कि मौजूदा समय में रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 के तहत उप निबंधक के पास संदिग्ध मामलों में रजिस्ट्री रोकने का पर्याप्त अधिकार नहीं था। इसी कमी को दूर करने के लिए कानून में संशोधन करने का निर्णय लिया गया है।
संशोधन के तहत अधिनियम में धारा 22-A, 22-B और 35-A जोड़ी जाएंगी। इन धाराओं के माध्यम से कुछ श्रेणियों के दस्तावेजों के पंजीकरण पर रोक लगाने और रजिस्ट्री से पहले संपत्ति की पहचान सुनिश्चित करने की व्यवस्था की जाएगी।
इसके साथ ही रजिस्ट्री के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों के साथ स्वामित्व, अधिकार, पहचान, वैध कब्जा और अंतरण से जुड़े प्रमाण देना अनिवार्य होगा। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि संपत्ति का लेन-देन पूरी तरह वैध है।
जरूरी दस्तावेज न होने पर नहीं होगी रजिस्ट्री
सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में जिन दस्तावेजों को अनिवार्य किया जाएगा, यदि वे उपलब्ध नहीं होंगे तो उप निबंधक को रजिस्ट्री करने से इनकार करने का अधिकार होगा।
अधिकारियों के अनुसार कई अन्य राज्यों में भी इस तरह की व्यवस्था पहले से लागू है और इससे संपत्ति विवादों में काफी कमी आई है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब इस संशोधन संबंधी विधेयक को आगामी विधानमंडल सत्र में पेश किया जाएगा।
गौरतलब है कि राज्य में पहले से ही रजिस्ट्री के समय आधार और मोबाइल नंबर से ओटीपी के जरिए पहचान सत्यापन की व्यवस्था लागू है। अब स्वामित्व की जांच भी अनिवार्य होने से फर्जी रजिस्ट्री के मामलों में काफी हद तक कमी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
दान विलेख में अब सर्किल रेट के आधार पर लगेगा निबंधन शुल्क
कैबिनेट ने संपत्ति से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में दान विलेख (Gift Deed) के निबंधन शुल्क से संबंधित नियमों में भी बदलाव किया है।
अब दान विलेख के मामले में संपत्ति के सर्किल रेट के आधार पर एक प्रतिशत निबंधन शुल्क लिया जाएगा। पहले कई मामलों में संपत्ति का मूल्य सर्किल रेट से कम दिखाकर कम शुल्क जमा किया जाता था।
हालांकि रक्त संबंधियों के बीच दान विलेख के मामलों में स्टांप ड्यूटी की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी, जिसमें केवल 5000 रुपये शुल्क देना होता है।
सरकार का कहना है कि नए नियम से निबंधन शुल्क के निर्धारण में एकरूपता आएगी और राजस्व हानि की संभावना भी कम होगी।
राज्य सरकार का मानना है कि संपत्ति रजिस्ट्री से पहले स्वामित्व जांच की अनिवार्यता से जमीन और मकान से जुड़े विवादों में कमी आएगी। साथ ही पंजीकरण प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनेगी, जिससे आम लोगों को लंबे कानूनी झंझटों से राहत मिल सकेगी।








