लखनऊ, 23 फरवरी 2026 (सोमवार)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के सिंगापुर दौरे के दौरान प्रवासी भारतीय समुदाय का उत्साह देखते ही बन रहा था। सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट और “योगी हैं तो यूपी है” के नारों ने माहौल को ऊर्जा से भर दिया। यह सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था—यह भावनाओं, जुड़ाव और भरोसे का सार्वजनिक प्रदर्शन भी था।
कार्यक्रम के बीच जब सिंगापुर में रह रहीं भारतीय मूल की स्वाति नामक महिला ने मुख्यमंत्री को ‘भैया’ कहकर संबोधित किया, तो वातावरण एकदम भावुक हो उठा। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा (Women Safety) के हालात में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और अब महिलाएं रात में भी निडर होकर बाहर निकल सकती हैं। उनके शब्दों में, “जब संत सियासत में आता है तो सियासत इबादत बन जाती है।”
स्वाति ने खुद को प्रदेश की “साढ़े 11 करोड़ महिलाओं” की ओर से संबोधित करते हुए कहा कि कानून का भय (Rule of Law) अब अपराधियों में स्पष्ट दिखता है। उन्होंने संस्कृत में भी उद्घोष किया—“योगी नेतृत्वे प्रदेशः भवति सुरक्षितम् शुभम्।” इस वक्तव्य पर सभागार तालियों से गूंज उठा।
सांस्कृतिक जुड़ाव की झलक
कार्यक्रम में एक भावनात्मक क्षण तब आया जब एक छोटी बच्ची मुख्यमंत्री का बनाया हुआ स्केच लेकर मंच तक पहुंची। मुख्यमंत्री ने उस पर ऑटोग्राफ दिया और बच्ची के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। एक महिला ने मुख्यमंत्री की कलाई पर रक्षा सूत्र (राखी) भी बांधा—विदेश की धरती पर यह दृश्य सांस्कृतिक आत्मीयता का प्रतीक बन गया।
सिंगापुर स्थित Global Indian International School के विद्यार्थियों ने गणपति वंदना पर मनोहारी नृत्य प्रस्तुति दी। भारतीय परंपरा की झलक से कार्यक्रम स्थल भारतीय रंग में रंग गया। स्कूल के संस्थापक ने मुख्यमंत्री की तुलना सिंगापुर के संस्थापक प्रधानमंत्री Lee Kuan Yew से करते हुए कहा कि उनमें नेतृत्व की वही दृढ़ता और दूरदर्शिता दिखाई देती है।
मुख्यमंत्री का संबोधन
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी भारतीय समुदाय अपने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखे हुए है। उन्होंने बच्चों की प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय शास्त्रीय परंपरा (Classical Heritage) को वैश्विक मंच पर इस तरह प्रस्तुत करना गर्व का विषय है।
सिंगापुर में गूंजा “योगी हैं तो यूपी है” नारा केवल राजनीतिक समर्थन का संकेत नहीं था; यह प्रवासी भारतीयों के मन में अपने राज्य और संस्कृति के प्रति गहरे लगाव का प्रतीक भी बनकर उभरा।








