जम्मू/02 नवंबर 2026: देश में भूकंप की निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की तैयारी है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय देशभर में 100 नई भूकंपीय वेधशालाएं स्थापित करने की योजना बना रहा है। इस विस्तार के बाद वैज्ञानिक 2.5 तीव्रता तक के छोटे भूकंपों का भी बेहतर तरीके से पता लगा सकेंगे। खास बात यह है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में चार-चार नई वेधशालाएं स्थापित की जाएंगी। इससे हिमालयी क्षेत्र में भूकंपों की निगरानी को मजबूती मिलेगी और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
100 नई भूकंपीय वेधशालाएं: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को मिलेगा विशेष लाभ
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव श्रीनिवास कुमार तुम्माला ने बताया कि देश के राष्ट्रीय भूकंपीय नेटवर्क का लगातार विस्तार किया जा रहा है। वर्ष 2014 में इस नेटवर्क के तहत 84 स्टेशन काम कर रहे थे, जबकि अब इनकी संख्या बढ़कर 183 हो गई है।
उन्होंने यह जानकारी किश्तवाड़ में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा देश की 183वीं भूकंपीय वेधशाला के उद्घाटन के दौरान दी।
तुम्माला के मुताबिक, मंत्रालय की योजना देशभर में 100 और भूकंपीय वेधशालाएं स्थापित करने की है। इनमें चार केंद्र जम्मू-कश्मीर और चार लद्दाख में बनाए जाएंगे। इस पहल से उन क्षेत्रों में भी भूकंप की गतिविधियों को अधिक बारीकी से समझने में मदद मिलेगी, जहां भूगर्भीय हलचल पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी है।
अब 2.5 तीव्रता तक के भूकंपों का लगाया जा सकेगा पता
राष्ट्रीय भूकंपीय नेटवर्क की निगरानी क्षमता में बीते वर्षों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वर्ष 2014 में यह नेटवर्क 4 या उससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों का पता लगाने में सक्षम था। अब इसकी क्षमता बढ़कर 3 या उससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों की निगरानी तक पहुंच गई है।
प्रस्तावित 100 नई वेधशालाओं के स्थापित होने के बाद वैज्ञानिक 2.5 तीव्रता तक के भूकंपों का भी पता लगाने में सक्षम होंगे।
छोटे भूकंपों की निगरानी भी वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण होती है। इससे किसी क्षेत्र में होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है। हालांकि, छोटे भूकंपों का पता लगना अपने आप में किसी बड़े भूकंप की भविष्यवाणी नहीं है।
हिमालयी क्षेत्र में चौबीसों घंटे होगी निगरानी
राष्ट्रीय भूकंपीय नेटवर्क देशभर में चौबीसों घंटे भूकंप की गतिविधियों पर नजर रखता है। इसमें हिमालयी क्षेत्र और सीमावर्ती इलाके भी शामिल हैं।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में भूकंप की निगरानी का विशेष महत्व है। यहां भौगोलिक परिस्थितियों और भूगर्भीय गतिविधियों के कारण वैज्ञानिकों को लगातार डेटा जुटाने की जरूरत होती है।
नई वेधशालाओं के जरिए मिलने वाले आंकड़े भूकंप के केंद्र, उसकी तीव्रता और क्षेत्रीय गतिविधियों को समझने में मदद करेंगे। इससे वैज्ञानिक विश्लेषण के साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर आपदा प्रबंधन की योजनाओं को भी बेहतर बनाया जा सकेगा।
डिजिटल तकनीक से लैस है किश्तवाड़ की नई वेधशाला
किश्तवाड़ में हाल ही में स्थापित भूकंपीय वेधशाला को आधुनिक डिजिटल रिकॉर्डिंग तकनीक से लैस किया गया है। इसने पुरानी एनालॉग प्रणाली की जगह ली है।
डिजिटल तकनीक के जरिए भूकंप से संबंधित आंकड़ों को अधिक व्यवस्थित तरीके से रिकॉर्ड और विश्लेषित किया जा सकता है। किश्तवाड़ की यह वेधशाला चिनाब घाटी और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में भूकंप की निगरानी के लिहाज से अहम भूमिका निभाएगी।
श्रीनगर समेत पांच शहरों में माइक्रोजोनेशन अध्ययन पूरा
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भूकंप से होने वाले संभावित नुकसान को कम करने के लिए सिस्मिक माइक्रोजोनेशन यानी भूकंपीय सूक्ष्म-क्षेत्रीकरण पर भी काम कर रहा है।
राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (एनसीएस) ने श्रीनगर सहित पांच शहरों में माइक्रोजोनेशन अध्ययन पूरा कर लिया है। इसके अलावा आठ अन्य शहरों की रिपोर्ट जल्द जारी किए जाने की बात कही गई है।
माइक्रोजोनेशन अध्ययन के जरिए किसी शहर के अलग-अलग हिस्सों में भूकंप के संभावित प्रभाव का आकलन किया जाता है। जमीन की प्रकृति और स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई ऐसी रिपोर्ट भवन निर्माण, शहरी नियोजन और आपदा प्रबंधन में उपयोगी साबित हो सकती है।
मोबाइल एप और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिलेगी रियल-टाइम जानकारी
भूकंप से जुड़ी जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने के लिए मंत्रालय डिजिटल माध्यमों का भी इस्तेमाल कर रहा है।
एनसीएस की वेबसाइट और ‘भूकंप’ मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए भूकंप से संबंधित रियल-टाइम जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा एसएमएस, ईमेल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी सूचनाएं साझा की जाती हैं।
मंत्रालय के अनुसार, ऑब्जर्वेशन नेटवर्क, रडार और ऑटोमैटिक वेदर स्टेशनों के विस्तार से मौसम की निगरानी और पूर्वानुमान क्षमता में भी सुधार हुआ है।
किसे मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा?
नई भूकंपीय वेधशालाओं का सबसे बड़ा लाभ उन क्षेत्रों को मिलने की उम्मीद है, जहां भूकंप की गतिविधियों पर लगातार निगरानी जरूरी है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के साथ हिमालयी क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी इससे वैज्ञानिक निगरानी को मजबूती मिलेगी।
बेहतर भूकंपीय डेटा से वैज्ञानिकों को क्षेत्रीय गतिविधियों का अध्ययन करने, प्रशासन को आपदा प्रबंधन की योजनाएं तैयार करने और शहरी क्षेत्रों में सुरक्षित निर्माण की दिशा में काम करने में मदद मिल सकती है।
भूकंप को रोकना संभव नहीं है, लेकिन उसकी गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझना और जोखिम को कम करने की तैयारी करना जरूर संभव है। देश में 100 नई वेधशालाओं की प्रस्तावित योजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।












