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असम में सीआरपीएफ स्थापना दिवस पर अमित शाह का बड़ा ऐलान: 31 मार्च तक नक्सलवाद खत्म करने का संकल्प

On: February 21, 2026
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असम में सीआरपीएफ स्थापना दिवस पर अमित शाह का बड़ा ऐलान
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दिसपुर, 21 फरवरी 2026। पूर्वोत्तर भारत ने शनिवार को एक ऐतिहासिक क्षण देखा, जब केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) का 87वां स्थापना दिवस पहली बार असम की धरती पर आयोजित हुआ। गुवाहाटी में आयोजित भव्य परेड में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े कई अहम मुद्दों पर स्पष्ट संदेश दिया। सबसे बड़ा बयान रहा—31 मार्च तक नक्सलवाद खत्म करने का संकल्प।

शाह ने कहा कि 86 वर्षों के इतिहास में पहली बार सीआरपीएफ की रेजिंग डे परेड पूर्वोत्तर में आयोजित हो रही है। यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर के महत्व और उसकी बदलती पहचान का प्रतीक है। उन्होंने याद दिलाया कि 2019 में यह निर्णय लिया गया था कि स्थापना दिवस परेड हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित की जाएगी, ताकि सुरक्षा बलों की भूमिका को देश के हर कोने में रेखांकित किया जा सके।

“31 मार्च तक देश से नक्सल समस्या का सफाया”

अपने संबोधन में गृह मंत्री ने दृढ़ स्वर में कहा कि केंद्र सरकार और सुरक्षा बलों की संयुक्त रणनीति ने माओवाद के प्रभाव को निर्णायक रूप से कमजोर किया है। उन्होंने भरोसा जताया कि 31 मार्च तक नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा।

शाह ने कहा कि सीआरपीएफ ने जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी जैसी घटनाओं को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई, जहां ऐसी घटनाएं अब लगभग शून्य पर पहुंच गई हैं। इसके अलावा, मणिपुर में जातीय हिंसा से निपटने और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में ऑपरेशन तेज करने में भी बल की भूमिका निर्णायक रही है।

उनका यह बयान केवल राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि सुरक्षा तंत्र की आत्मविश्वासपूर्ण रणनीति का संकेत भी माना जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले तीन वर्षों में माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है।


वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम 2.0 की शुरुआत

गुवाहाटी कार्यक्रम से पहले अमित शाह ने कछार जिले के कटिगरा स्थित भारत-बांग्लादेश सीमा के नतनपुर में ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम 2.0’ की शुरुआत की।

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी गई है। इस चरण में देश के 17 राज्यों के 334 ब्लॉकों और लगभग 1,954 गांवों में विकास योजनाएं चलाई जाएंगी। असम के 140 सीमावर्ती गांव भी इस कार्यक्रम में शामिल हैं।

शाह ने कहा, “सीमाएं सिर्फ सुरक्षा की रेखा नहीं होतीं, वे विकास की भी पहली सीढ़ी होती हैं।” उनके शब्दों में एक राजनीतिक संदेश भी था—सीमांत इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ना सरकार की प्राथमिकता है।

अवैध अतिक्रमण पर सख्त रुख

असम में अवैध अतिक्रमण को गृह मंत्री ने “सबसे बड़ी समस्या” करार दिया। उन्होंने कहा कि कई गांवों की जमीन पर अवैध कब्जे हुए हैं, जिससे स्थानीय लोगों के अधिकार प्रभावित हुए हैं।

शाह ने दावा किया कि पिछले दस वर्षों में भाजपा सरकार ने इस दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में अतिक्रमण हटाने का अभियान जारी है, जिसमें घुसपैठियों की पहचान कर चरणबद्ध कार्रवाई की जा रही है।

उन्होंने संकेत दिया कि यह कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी और राज्य की जनसांख्यिकीय व सामाजिक संतुलन की रक्षा के लिए कठोर निर्णय लिए जाएंगे।

कांग्रेस पर राजनीतिक हमला

सिलचर में जनसभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने बुनियादी ढांचे के विकास का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों में असम में औसतन 14 किलोमीटर प्रतिदिन सड़क निर्माण हुआ, सैकड़ों पुलों का निर्माण हुआ और चार बड़े पुलों का उद्घाटन किया गया।

शाह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी ने असम के विकास और सीमा सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों की “ढिलाई” के कारण घुसपैठ की समस्या बढ़ी और असमिया लोगों के अधिकार प्रभावित हुए।

पूर्वोत्तर की बदलती तस्वीर

गुवाहाटी में आयोजित यह परेड सिर्फ सैन्य अनुशासन का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि पूर्वोत्तर की बदलती राजनीतिक और सुरक्षा परिदृश्य की झलक भी थी। दशकों तक उग्रवाद, अलगाववाद और सीमाई तनाव से जूझता यह क्षेत्र अब राष्ट्रीय मंच पर एक नए आत्मविश्वास के साथ खड़ा दिख रहा है।

अमित शाह का 31 मार्च तक नक्सलवाद खत्म करने का बयान आने वाले हफ्तों में सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता और राजनीतिक बहस दोनों को तेज कर सकता है।

फिलहाल, असम की इस ऐतिहासिक परेड ने यह संदेश जरूर दे दिया है कि केंद्र सरकार पूर्वोत्तर को सिर्फ रणनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि विकास और राष्ट्रीय एकीकरण के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देख रही है।

और अब सबकी निगाहें 31 मार्च पर टिकी हैं—क्या वाकई देश नक्सलवाद के अध्याय को बंद होते देखेगा? समय इसका उत्तर देगा।

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