मुंबई/14 सितंबर 2026। हिंदी दिवस के मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भाषा को लेकर ऐसा संदेश दिया, जिसमें हिंदी के साथ-साथ देश की दूसरी भारतीय भाषाओं को भी महत्व देने की बात सामने आई। नवी मुंबई के सिडको प्रदर्शनी केंद्र में आयोजित हिंदी दिवस समारोह और छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए शाह ने कहा कि बच्चों को अपनी मातृभाषा के साथ कम से कम एक दूसरी भारतीय भाषा भी सीखनी चाहिए।
अमित शाह हिंदी दिवस के इस संबोधन में भाषा को केवल पढ़ाई या संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और राष्ट्रीय एकता से जोड़कर देखने की कोशिश दिखाई दी। शाह ने कहा कि मातृभाषा बच्चे को अपनी जड़ों से जोड़ती है, जबकि दूसरी भारतीय भाषा उसे देश के दूसरे हिस्सों के लोगों और संस्कृतियों को समझने का अवसर देती है।
अमित शाह हिंदी दिवस पर मातृभाषा के साथ दूसरी भाषा पर जोर
अमित शाह ने कहा कि बच्चे के शुरुआती विकास में मातृभाषा की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि अपनी भाषा में सीखने से बच्चा अपनी संस्कृति, परिवेश और जड़ों से बेहतर तरीके से जुड़ता है। इसी के साथ उन्होंने दूसरी भारतीय भाषा सीखने की जरूरत पर भी जोर दिया।
उनके मुताबिक दूसरी भारतीय भाषा का ज्ञान बच्चे के दृष्टिकोण को व्यापक बनाता है। वह अपने राज्य या भाषाई क्षेत्र तक सीमित रहने के बजाय देश के दूसरे हिस्सों को भी समझने लगता है। शाह ने इसे ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना से जोड़ते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं का ज्ञान राष्ट्रीय जुड़ाव को मजबूत कर सकता है।
यानी संदेश सिर्फ इतना नहीं था कि बच्चे एक अतिरिक्त भाषा सीखें। इसके पीछे सोच यह है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा दूसरे समाज और संस्कृति तक पहुंचने का रास्ता भी बन सकती है।
नई शिक्षा नीति में भाषा को लेकर क्या बोले अमित शाह?
अमित शाह ने भाषा के मुद्दे को नई शिक्षा नीति से भी जोड़ा। उन्होंने प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा को महत्व दिए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि शुरुआती शिक्षा बच्चे के विकास की बुनियाद तैयार करती है और इस चरण में अपनी भाषा की अहम भूमिका है।
इसके साथ ही दूसरी भारतीय भाषा सीखने पर जोर देकर उन्होंने भाषाई विविधता से परिचित कराने की बात कही। उनके अनुसार इससे बच्चों में देश के अलग-अलग हिस्सों के प्रति समझ विकसित होगी और वे भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं से अधिक करीब से जुड़ सकेंगे।
भाषा को लेकर उनका यह तर्क उस व्यापक विचार से जुड़ा है, जिसमें भारतीय भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय उनके परस्पर सहयोग और आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की बात कही जाती है।
महाराष्ट्र की बहुभाषी संस्कृति का भी किया उल्लेख
महाराष्ट्र में आयोजित कार्यक्रम में शाह ने राज्य की भाषाई विविधता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मराठी का सम्मान जरूरी है, लेकिन महाराष्ट्र में लंबे समय से मराठी के साथ कोंकणी, गुजराती, सिंधी, हिंदी और कन्नड़ जैसी भाषाएं भी अलग-अलग समुदायों के बीच बोली जाती रही हैं।
उन्होंने मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने का जिक्र करते हुए इसे महाराष्ट्र की भाषा और सांस्कृतिक विरासत के सम्मान से जोड़ा। उनके भाषण में यह बात बार-बार उभरकर आई कि भारत की भाषाई विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी विशेष ताकत है।
महाराष्ट्र जैसे राज्य में, जहां अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों की भाषाएं एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं, यह उदाहरण उनके भाषाई दृष्टिकोण को समझने का एक महत्वपूर्ण संदर्भ भी रहा।
हिंदी के विकास के साथ दूसरी भारतीय भाषाओं की भी बात
हिंदी दिवस के मंच से अमित शाह ने हिंदी की भूमिका पर बात करते हुए भारतीय भाषाओं को साथ लेकर आगे बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने अपने गुजरात से होने का उल्लेख करते हुए कहा कि गुजरात में गुजराती बोली जाती है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी मिलने के बाद हिंदी का ज्ञान उनके लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने में उपयोगी रहा।
शाह ने राजभाषा हिंदी के विकास को भारतीय भाषाओं के विकास से अलग करके देखने के बजाय उनके बीच संबंध मजबूत करने की बात कही। उन्होंने कहा कि देश की भाषाओं को समृद्ध बनाने के लिए एक-दूसरे की भाषाओं से शब्दों को अपनाने की जरूरत है।
इसी संदर्भ में उन्होंने वीर सावरकर और ‘सिंधु शब्दकोश’ का भी उल्लेख किया।
वंदे मातरम्, गणेश उत्सव और सांस्कृतिक चेतना का जिक्र
अमित शाह के संबोधन में भाषा के साथ संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के विषय भी जुड़े रहे। उन्होंने वंदे मातरम् को केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय चेतना को जगाने वाले प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि गुलामी के दौर में वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करने में भूमिका निभाई। वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ और हिंदी दिवस के आयोजन को छत्रपति शिवाजी महाराज की धरती महाराष्ट्र से जोड़ते हुए उन्होंने इसे विशेष महत्व का बताया।
शाह ने गणेश उत्सव का भी उल्लेख किया और कहा कि लोकमान्य तिलक ने 1893 में इसे सांस्कृतिक जागरण से जोड़ने का काम किया था। इस तरह उनके भाषण में भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े दिखाई दिए।
हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने का संदेश
कुल मिलाकर, अमित शाह हिंदी दिवस के कार्यक्रम में दिया गया संदेश हिंदी को बढ़ावा देने के साथ दूसरी भारतीय भाषाओं के महत्व पर भी केंद्रित रहा। मातृभाषा को बच्चे की शुरुआती शिक्षा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हुए उन्होंने दूसरी भारतीय भाषा को देश की विविधता को समझने का माध्यम बताया।
नई शिक्षा नीति, महाराष्ट्र की बहुभाषी पहचान और हिंदी के विकास का उदाहरण देते हुए शाह ने भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर दिया। उनके संबोधन की केंद्रीय बात यही रही कि भाषा को एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा करने के बजाय उसे भारत की विविधता और एकता के बीच पुल के रूप में देखा जाए।













