नई दिल्ली/21 सितंबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा गिरफ्तारी को लेकर महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति की पहली गिरफ्तारी संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन करते हुए की गई थी और गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए जाने के कारण उसे रिहा किया गया, तो उसी व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार करने के लिए पुलिस अपनी मर्जी से आगे नहीं बढ़ सकती। ऐसे मामले में संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से अनुमति लेना जरूरी होगा।
यह फैसला न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के 21 सितंबर 2026 के रिकॉर्ड में भी दोनों न्यायाधीशों की पीठ दर्ज है।
दोबारा गिरफ्तारी से पहले मजिस्ट्रेट की अनुमति क्यों जरूरी?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताना उसका मौलिक अधिकार है। अदालत ने पहले भी मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराने के महत्व पर जोर दिया था। नवंबर 2025 के उस फैसले में अदालत ने अनुच्छेद 22(1) और तत्कालीन CrPC की धारा 50 से जुड़े सवालों पर विचार किया था; मौजूदा कानूनी व्यवस्था में संबंधित प्रावधान BNSS की धारा 47 है।
अब पीठ ने कहा है कि यदि पहली गिरफ्तारी इसी संवैधानिक सुरक्षा के उल्लंघन के कारण अवैध ठहराकर व्यक्ति को रिहा किया गया है, तो उसकी दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया न्यायिक निगरानी के तहत होगी।
पुलिस को संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देना होगा। इस आवेदन से पहले आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराए जाने होंगे।
पुलिस को बताना होगा कि पहली बार कारण क्यों नहीं बताए गए
अदालत ने प्रक्रिया को केवल मजिस्ट्रेट की अनुमति तक सीमित नहीं रखा है। दोबारा गिरफ्तारी की मांग करने वाले आवेदन में पुलिस को यह भी स्पष्ट करना होगा कि पहली गिरफ्तारी के समय आरोपी को गिरफ्तारी के आधार क्यों नहीं बताए जा सके थे।
मजिस्ट्रेट को यह देखना होगा कि परिस्थितियां वास्तव में ऐसी थीं जिनमें शुरुआत में गिरफ्तारी के आधार बताना संभव नहीं था। साथ ही अदालत यह भी जांचेगी कि बाद में आधार बताए गए हैं और आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की वास्तविक आवश्यकता मौजूद है।
इन दोनों पहलुओं से संतुष्ट होने के बाद ही मजिस्ट्रेट जांच एजेंसी को दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति दे सकेगा।
पहली गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी पर भी होगी कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत के अनुसार, यदि पहली गिरफ्तारी में अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन हुआ था तो उस अधिकारी के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए।
अदालत का तर्क है कि जिस अधिकारी की कार्रवाई के कारण संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ, उसी अधिकारी के विवेक पर आरोपी की दोबारा गिरफ्तारी छोड़ना उचित नहीं होगा। इसलिए ऐसी स्थिति में प्रक्रिया को न्यायिक नियंत्रण में रखना जरूरी है।
पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति मांगने की स्थिति में जांच किसी दूसरे पुलिस अधिकारी को सौंपी जाए। वरिष्ठ अधिकारी को मामले की गंभीरता को देखते हुए विभागीय जांच की प्रक्रिया भी शुरू करनी होगी।
यदि विभागीय जांच में संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष सामने आते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई के साथ उसकी सेवा पुस्तिका में भी प्रविष्टि की जा सकती है।
अनुच्छेद 22(1) हर गिरफ्तारी पर लागू
सुप्रीम कोर्ट ने इस संवैधानिक सुरक्षा का दायरा भी स्पष्ट किया है। अनुच्छेद 22(1) किसी एक विशेष आपराधिक कानून तक सीमित नहीं है। गिरफ्तारी चाहे सामान्य आपराधिक कानून के तहत हो या किसी विशेष कानून के तहत, गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना संवैधानिक आवश्यकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी को यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए जाने से उसे वास्तविक नुकसान हुआ। वजह यह है कि गिरफ्तारी के आधार जानने का अधिकार स्वयं एक मौलिक अधिकार है।
अवैध गिरफ्तारी के बाद रिहाई को जमानत नहीं माना जाएगा
फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण गिरफ्तारी रद्द होने के बाद व्यक्ति की रिहाई को सामान्य जमानत पर रिहाई के समान नहीं माना जाएगा।
यानी यदि पहली गिरफ्तारी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन न करने के कारण अवैध घोषित हुई है, तो बाद में उसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की प्रक्रिया को महज जमानत रद्द कराने या दोबारा हिरासत में लेने की सामान्य प्रक्रिया की तरह नहीं देखा जा सकता। इसके लिए अदालत द्वारा निर्धारित अतिरिक्त सुरक्षा उपायों का पालन करना होगा।
मिहिर राजेश शाह मामले से जुड़ा है फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को समझाते हुए मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में निर्धारित सिद्धांतों का संदर्भ लिया है। नवंबर 2025 के फैसले में भी अदालत ने गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराने को अनुच्छेद 22(1) के तहत महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा माना था।
मौजूदा फैसले में अदालत ने इसी संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दोबारा गिरफ्तारी के लिए अतिरिक्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय तय किए हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पहली गिरफ्तारी में हुई संवैधानिक चूक के बाद दूसरी गिरफ्तारी केवल पुलिस के प्रशासनिक निर्णय के आधार पर न हो।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश एक नजर में
- अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण अवैध घोषित गिरफ्तारी के बाद दोबारा गिरफ्तारी के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी होगी।
- आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में दिए जाने होंगे।
- पुलिस को बताना होगा कि पहली गिरफ्तारी में आधार क्यों नहीं बताए गए थे।
- मजिस्ट्रेट को दोबारा गिरफ्तारी की आवश्यकता और परिस्थितियों से संतुष्ट होना होगा।
- पहली गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जाएगी।
- दोबारा गिरफ्तारी की स्थिति में जांच दूसरे अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
- अनुच्छेद 22(1) का संरक्षण सामान्य और विशेष कानूनों के तहत होने वाली गिरफ्तारियों पर लागू होता है।
- संवैधानिक उल्लंघन के मामले में आरोपी को अलग से यह साबित करने की जरूरत नहीं कि उसे नुकसान हुआ।
- ऐसी अवैध गिरफ्तारी के बाद रिहाई को सामान्य जमानत पर रिहाई नहीं माना जाएगा।













