नई दिल्ली /23 अक्टूबर 2026: प्रशांत महासागर में बढ़ता तापमान इस बार भारत की सर्दियों का मिजाज बदल सकता है। जलवायु मॉडलों के संकेतों के मुताबिक, दिसंबर 2026 में अल नीनो की स्थिति मजबूत होकर अपने चरम पर पहुंच सकती है। इसका असर नवंबर से जनवरी के बीच तापमान पर दिखाई देने की संभावना है। ऐसे में देश के कई हिस्सों में सर्दी सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया जा रहा है। हालांकि, उत्तर भारत में ठंड कितनी पड़ेगी, यह पश्चिमी विक्षोभ, पहाड़ों पर बर्फबारी और उत्तर-पश्चिमी हवाओं की सक्रियता पर भी निर्भर करेगा।
अल नीनो का असर: दिसंबर में बढ़ सकती है गर्मी, कमजोर रह सकती है सर्दी
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के आकलन के मुताबिक, उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में बदलाव के कारण आने वाले महीनों में मौसम का सामान्य पैटर्न प्रभावित हो सकता है। नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के दौरान अल नीनो की स्थिति और मजबूत होने की संभावना जताई गई है। कुछ जलवायु मॉडल दिसंबर में इसके चरम पर पहुंचने के संकेत दे रहे हैं।
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका प्रभाव दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में तापमान और वर्षा के स्वरूप पर पड़ सकता है। भारत में भी इसके असर से सर्दियों के दौरान तापमान सामान्य से ऊपर रहने की परिस्थितियां बन सकती हैं। हालांकि, इसका प्रभाव हर राज्य और क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता।
दिल्ली, यूपी, पंजाब और हरियाणा में कैसी रहेगी ठंड?
अल नीनो का असर रहने के बावजूद उत्तर भारत के लोगों को ठंड से पूरी तरह राहत मिलेगी, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और बिहार में मौसम का मिजाज समय-समय पर बदल सकता है। पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने पर पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी होगी तो मैदानी क्षेत्रों में भी ठंडी हवाएं चल सकती हैं।
ऐसे मौकों पर न्यूनतम तापमान में गिरावट दर्ज की जा सकती है। सुबह और रात के समय ठिठुरन बढ़ने के साथ कुछ इलाकों में शीतलहर जैसी परिस्थितियां भी बन सकती हैं। इसलिए मौसमी परिस्थितियों के आधार पर कुछ दिनों तक कड़ाके की ठंड पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
पश्चिमी विक्षोभ और पहाड़ों की बर्फबारी भी तय करेगी सर्दी का मिजाज
उत्तर भारत में सर्दियों की तीव्रता केवल प्रशांत महासागर में होने वाली हलचल से तय नहीं होती। पश्चिमी विक्षोभ, हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी, उत्तर-पश्चिमी हवाओं की दिशा और स्थानीय मौसमी परिस्थितियां भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।
यदि सर्दियों के दौरान पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय रहते हैं और पहाड़ों पर अच्छी बर्फबारी होती है, तो मैदानी इलाकों में तापमान गिर सकता है। दूसरी ओर, इन मौसमी प्रणालियों की गतिविधियां कमजोर रहने पर ठंड का प्रभाव सीमित रह सकता है।
स्काईमेट के उपाध्यक्ष महेश पलावत के हवाले से दी गई जानकारी के अनुसार, अल नीनो का प्रभाव फरवरी 2027 तक बना रह सकता है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में इसका असर अलग हो सकता है। ऐसे में पूरे देश के लिए एक जैसा तापमान या ठंड का अनुमान लगाना सही नहीं होगा।
क्या इस बार लंबे समय तक नहीं पड़ेगी कड़ाके की ठंड?
मौजूदा मौसमी संकेतों से सर्दियों के सामान्य से गर्म रहने की संभावना पर चर्चा तेज हुई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इस बार ठंडी हवाएं नहीं चलेंगी या तापमान में बड़ी गिरावट नहीं आएगी। अल नीनो एक व्यापक जलवायु संकेतक है, जबकि किसी शहर में किसी खास दिन कितनी ठंड पड़ेगी, यह स्थानीय मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के 21 अक्टूबर 2026 के मौसमी आकलन में नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के दौरान अल नीनो के और मजबूत होने तथा दिसंबर के आसपास इसके चरम पर पहुंचने का अनुमान जताया गया है। वहीं, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का आधिकारिक शीतकालीन पूर्वानुमान आने के बाद ही देश के विभिन्न हिस्सों में तापमान और शीतलहर की संभावनाओं को लेकर अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।
फिलहाल संकेत यही हैं कि इस सर्दी में मौसम सामान्य से अलग रह सकता है। फिर भी ठंड की वास्तविक तीव्रता का आकलन करने के लिए आने वाले दिनों के स्थानीय मौसम पूर्वानुमानों पर नजर रखना जरूरी होगा।













