नई दिल्ली/23 अक्टूबर 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाज में एकता, सांस्कृतिक मूल्यों और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने का आह्वान किया है। शुक्रवार को चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि समाज को बांटने वाली ताकतों के खिलाफ सभी को एकजुट होकर खड़ा होना होगा। साथ ही, नागरिकों को जागरूक बनाकर आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित करना और प्रत्येक व्यक्ति को वर्ष 2047 तक विकसित भारत के संकल्प से जोड़ना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने भारतीय संस्कृति को राष्ट्र की पहचान और उसके अस्तित्व का आधार बताते हुए नई पीढ़ी तक सांस्कृतिक मूल्यों को पहुंचाने के महत्व पर भी जोर दिया।
पीएम मोदी बोले- समाज को बांटने वाली ताकतों के खिलाफ एकजुट होना जरूरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बीते दशकों में देश और समाज में काफी बदलाव आए हैं। समय के साथ नई चुनौतियां सामने आई हैं और सामाजिक जीवन में कई तरह की समस्याएं भी उभरी हैं। इनसे निपटने के लिए सामूहिक प्रयास और सामाजिक जागरूकता आवश्यक है।
उन्होंने नागरिकों से समाज में विभाजन पैदा करने वाली ताकतों के खिलाफ एकजुट रहने और लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करने की अपील की। प्रधानमंत्री के अनुसार, विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब देश का प्रत्येक नागरिक इस संकल्प से जुड़े और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाए।
चिन्मय मिशन केवल संस्था नहीं, एक विचार है: प्रधानमंत्री
चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने चिन्मय मिशन की आध्यात्मिक यात्रा और उसके योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चिन्मय मिशन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक विचार है। ‘चिन्मय’ का अर्थ शुद्ध चेतना से जुड़ा है और मिशन की यात्रा लंबे समय से आध्यात्मिक संकल्पों पर आधारित रही है।
प्रधानमंत्री ने भारतीय संस्कृति को देश की पहचान और उसके अस्तित्व का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत बनाए रखने के लिए उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।
उनके संबोधन में यह संदेश भी प्रमुख रहा कि आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक चेतना समाज को जोड़ने तथा नागरिकों को जिम्मेदारी का एहसास कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
9,000 से अधिक प्रतिभागी होंगे शामिल, तीन दिन चलेगा सम्मेलन
चिन्मय अमृत महोत्सव के तहत आयोजित तीन दिवसीय वैश्विक सम्मेलन में भारत और विदेशों से 9,000 से अधिक प्रतिभागियों के शामिल होने की जानकारी दी गई है। यह आयोजन चिन्मय मिशन की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में चल रहे सालभर के समारोहों का समापन है।
चिन्मय मिशन की स्थापना स्वामी चिन्मयानंद ने वर्ष 1951 में की थी। मिशन का प्रमुख उद्देश्य वेदांत और भगवद्गीता के ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाना है।
समय के साथ मिशन ने आध्यात्मिक शिक्षा, सांस्कृतिक जागरूकता और युवाओं के बीच भारतीय दर्शन की समझ विकसित करने के लिए विभिन्न गतिविधियां संचालित की हैं। प्रधानमंत्री ने इन प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि लाखों युवा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के दूत के रूप में काम कर रहे हैं।
युवाओं के सामने सूचना और ज्ञान के बीच अंतर समझने की चुनौती
सम्मेलन के दौरान चिन्मय मिशन के संत स्वामी मित्रानंद सरस्वती ने युवाओं की भूमिका और आध्यात्मिक समझ के महत्व पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी के सामने बड़ी चुनौती सूचना और वास्तविक ज्ञान के बीच अंतर को समझना है।
उनके मुताबिक, केवल जानकारी जुटा लेना ही बुद्धिमत्ता नहीं है। जीवन के अनुभव, विवेक और आध्यात्मिक समझ से ही व्यक्ति किसी विषय को गहराई से समझ पाता है। उन्होंने राष्ट्रसेवा को ईश्वर की सेवा के समान बताते हुए युवाओं को देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश दिया।
स्वामी मित्रानंद सरस्वती ने बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं के नेतृत्व में हुए राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय युवा अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़े हैं। उन्होंने भारत में ऐसी स्थिति उत्पन्न होने की संभावना से असहमति जताई।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में संस्कृति और नागरिकों की भूमिका अहम
प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन का मुख्य संदेश सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने से जुड़ा रहा। उन्होंने प्रत्येक नागरिक को विकसित भारत 2047 के संकल्प से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
देश की विकास यात्रा में बुनियादी ढांचे, तकनीक और आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक सहभागिता भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में नागरिकों को जागरूक बनाना, युवाओं में जिम्मेदारी की भावना विकसित करना और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य का हिस्सा है।
चिन्मय अमृत महोत्सव के मंच से दिया गया संदेश इसी विचार पर केंद्रित रहा कि समाज की एकता और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी के बिना विकसित भारत का सपना पूरा करना कठिन होगा।













