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लखनऊ: अमौसी की हवा दमघोंटू, चारबाग में शोर बेकाबू, बारिश के बाद भी राजधानी की हवा में धूल

On: November 3, 2026
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लखनऊ, अमौसी की हवा दमघोंटू, चारबाग में शोर बेकाबू
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लखनऊ/3 नवंबर 2026। राजधानी लखनऊ में अच्छी बारिश के बाद भी हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। सड़क निर्माण, जगह-जगह हो रही खुदाई, बढ़ते वाहनों और उड़ती धूल ने शहर की आबोहवा को फिर प्रदूषित कर दिया है। भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर) की पोस्ट-मानसून-2026 रिपोर्ट में सामने आया है कि पिछले साल के मुकाबले इस बार हवा में पीएम-10 और पीएम-2.5 की मात्रा बढ़ी है। औद्योगिक क्षेत्र अमौसी की स्थिति सबसे चिंताजनक रही, जबकि व्यावसायिक क्षेत्रों में चारबाग की हवा सबसे खराब दर्ज की गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी में पीएम-10 की औसत मात्रा इस बार 147.5 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रही, जबकि पिछले साल यह 114.8 थी। वहीं, पीएम-2.5 के स्तर में भी 8.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। बारिश के बाद भी प्रदूषण का स्तर ऊंचा बने रहना शहर में निर्माण गतिविधियों और यातायात से पैदा हो रही धूल की समस्या को उजागर करता है।

लखनऊ में वायु प्रदूषण: अमौसी में पीएम-10 का स्तर मानक से 88 फीसदी ज्यादा

आईआईटीआर की रिपोर्ट में औद्योगिक क्षेत्र अमौसी को सबसे अधिक प्रदूषित इलाकों में शामिल किया गया है। यहां पीएम-10 का औसत स्तर 188.5 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया, जो निर्धारित मानक से करीब 88 प्रतिशत अधिक है। वहीं, पीएम-2.5 का औसत स्तर 93.5 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा।

औद्योगिक गतिविधियों के बीच हवा में प्रदूषक कणों की इतनी अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिहाज से चिंता बढ़ाती है। खासकर उन लोगों के लिए, जो लंबे समय तक ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं या काम करते हैं।

पीएम-10 और पीएम-2.5 हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों को दर्शाते हैं। पीएम-10 के कण अपेक्षाकृत बड़े होते हैं, जबकि पीएम-2.5 के कण बेहद छोटे होने के कारण सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। इनकी अधिक मात्रा लंबे समय तक बनी रहने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

राजधानी के नौ इलाकों में आठ हफ्ते तक हुई वायु गुणवत्ता की जांच

आईआईटीआर की टीम ने सितंबर और अक्टूबर 2026 के दौरान आठ हफ्ते तक राजधानी के नौ स्थानों पर वायु गुणवत्ता की निगरानी की। जांच में अलीगंज, विकास नगर, इंदिरा नगर, गोमती नगर, चारबाग, आलमबाग, अमीनाबाद, चौक और अमौसी को शामिल किया गया।

इनमें चार आवासीय, चार व्यावसायिक और एक औद्योगिक क्षेत्र था। रिपोर्ट से पता चला कि प्रदूषण की समस्या अब केवल औद्योगिक क्षेत्रों या भीड़भाड़ वाले बाजारों तक सीमित नहीं है। आवासीय इलाकों में भी हवा की गुणवत्ता राष्ट्रीय मानकों से अधिक प्रदूषित पाई गई।

आवासीय क्षेत्रों में पीएम-10 का औसत स्तर 116 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर और पीएम-2.5 का स्तर 61.7 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया। यह स्थिति बताती है कि शहर के रिहायशी इलाकों में रहने वाले लोगों को भी प्रदूषण से राहत नहीं मिल रही है।

इंदिरानगर और चारबाग में प्रदूषण का स्तर सबसे ज्यादा

आईआईटीआर की रिपोर्ट के अनुसार, आवासीय क्षेत्रों में इंदिरानगर सबसे अधिक प्रदूषित रहा। वहीं, व्यावसायिक इलाकों में चारबाग की हवा सबसे खराब दर्ज की गई।

चारबाग में पीएम-10 का औसत स्तर 157.2 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर और पीएम-2.5 का औसत स्तर 81.6 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा। रेलवे स्टेशन, बसों, व्यावसायिक गतिविधियों और लगातार आवाजाही वाले इस क्षेत्र में प्रदूषण का बढ़ता स्तर चिंता का विषय है।

रिपोर्ट में शहर में चल रहे निर्माण और विकास कार्यों को प्रदूषण बढ़ने की प्रमुख वजह बताया गया है। अंडरपास, सड़क, फुटपाथ, केबल और पानी की पाइपलाइन बिछाने के लिए हो रही खुदाई से मिट्टी और धूल हवा में फैल रही है।

जाम के दौरान सड़क पर जमा धूल वाहनों के गुजरने से दोबारा हवा में उड़ने लगती है। यही वजह है कि बारिश के बाद भी राजधानी के कई हिस्सों में प्रदूषण का स्तर कम नहीं हो पा रहा है।

एक साल में लखनऊ में 4.9 प्रतिशत बढ़े वाहन

आईआईटीआर की रिपोर्ट में वाहनों की बढ़ती संख्या को भी प्रदूषण की प्रमुख वजहों में शामिल किया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 तक लखनऊ में पंजीकृत वाहनों की संख्या 31.99 लाख पहुंच गई थी। एक साल के भीतर इसमें 4.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

इस दौरान इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या में 59.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। हालांकि, पेट्रोल की खपत भी 5.6 प्रतिशत बढ़ गई। इससे स्पष्ट होता है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ने के बावजूद शहर में पारंपरिक ईंधन से चलने वाले वाहनों का दबाव बना हुआ है।

वाहनों की बढ़ती संख्या, निर्माण गतिविधियों और सड़कों पर उड़ती धूल का संयुक्त असर राजधानी की हवा पर पड़ रहा है। ऐसे में केवल बारिश के भरोसे प्रदूषण से राहत की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं होगा।

निर्माण स्थलों की धूल और यातायात पर नियंत्रण जरूरी

लखनऊ में वायु प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, सड़कों की नियमित सफाई और यातायात प्रबंधन जैसे उपायों की प्रभावी निगरानी जरूरी है। खासकर उन इलाकों में, जहां पीएम-10 और पीएम-2.5 का स्तर अधिक दर्ज किया गया है।

राजधानी में विकास कार्यों की जरूरत अपनी जगह है, लेकिन उनके दौरान पर्यावरणीय मानकों का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सड़कों और फुटपाथों की खुदाई के बाद खुले में पड़ी मिट्टी, निर्माण सामग्री और धूल को नियंत्रित नहीं किया गया तो प्रदूषण की समस्या लगातार बनी रह सकती है।

आईआईटीआर की पोस्ट-मानसून रिपोर्ट ने राजधानी की हवा को लेकर एक अहम चेतावनी दी है। बारिश के बाद भी प्रदूषण का स्तर बढ़ना यह संकेत देता है कि लखनऊ में स्वच्छ हवा के लिए केवल मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि ठोस और निरंतर प्रयासों की जरूरत है।

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