लखनऊ, (Thu, 13 Nov 2025)। उत्तर प्रदेश में पराली जलाने को लेकर लंबे समय से चल रही चिंता अब कम होती दिख रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लगातार दिए गए सख्त निर्देश, जिलाधिकारियों की मॉनिटरिंग और किसानों के बीच चलाए गए जागरूकता अभियानों का ठोस परिणाम यह है कि राज्य में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है। सरकार के इन प्रयासों ने Stubble Control को सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखने वाला एक ठोस बदलाव बना दिया है।
20 जिलों में पराली जलाने की घटनाओं में कमी
सर्वे और मॉनिटरिंग रिपोर्टों के मुताबिक, 20 जिलों—मथुरा, पीलीभीत, सहारनपुर, बाराबंकी, लखीमपुर खीरी, कौशांबी, एटा, हरदोई, जालौन, फतेहपुर, महराजगंज, कानपुर देहात, झांसी, मैनपुरी, बहराइच, इटावा, गोरखपुर, अलीगढ़, उन्नाव और सीतापुर—में पराली जलाने की घटनाओं में स्पष्ट गिरावट दर्ज हुई है।
इनमें से एटा, कौशांबी, सीतापुर और उन्नाव वे जिले हैं जहाँ पराली जलाने की सबसे कम घटनाएँ दर्ज की गईं। विशेषज्ञ इस बदलाव को किसान–प्रशासन सहयोग और सीएम योगी के लगातार फॉलो-अप का प्रत्यक्ष असर मान रहे हैं।
सेटेलाइट निगरानी से बढ़ी जवाबदेही
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निर्देश दिया था कि पराली जलाने की हर घटना की सेटेलाइट से निगरानी हो, ताकि कोई भी घटना छिप न पाए।
ISRO आधारित रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम से प्रशासन के पास हर संदिग्ध क्षेत्र का डेटा तुरंत उपलब्ध होने लगा है। इस तकनीक ने जिलाधिकारियों की कार्यप्रणाली को भी तेज किया है और किसानों में जिम्मेदारी की भावना बढ़ाई है।
साथ ही फसल अवशेष प्रबंधन के वैकल्पिक उपायों—जैसे बायो-डीकंपोजर, कंपोस्ट तकनीक, मल्चर, रीपर-कम-बाइंडर और स्ट्रॉ मैनेजमेंट उपकरण—के लिए किसानों को प्रेरित किया गया। किसानों का कहना है कि इन तकनीकों से खेत की उर्वरता बढ़ी है और लागत भी कम हुई है।
जुर्माने और जवाबदेही—दोनों की व्यवस्था सख्त
राज्य सरकार ने पराली जलाने वालों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति शुल्क तय किया है:
- 2 एकड़ से कम क्षेत्र पर – ₹2,500
- 2 से 5 एकड़ तक – ₹5,000
- 5 एकड़ से अधिक पर – ₹15,000
इसके अतिरिक्त, हर 50 से 100 किसानों के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जा रहा है, जो यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके क्षेत्र में पराली प्रबंधन जिम्मेदारी से हो।
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जुर्माना केवल दंड नहीं, बल्कि किसानों में जिम्मेदारी जगाने का साधन है। परिणामस्वरूप पराली जलाने की घटनाएँ लगातार कम हो रही हैं।
जागरूकता ने बदली किसानों की सोच
सरकारी जागरूकता अभियानों ने इस बदलाव में बड़ा योगदान दिया।
किसानों को बताया गया कि पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता कम होती है, लाभकारी जीवाणु नष्ट होते हैं और वायु प्रदूषण बढ़ता है। अभियान के बाद कई किसान अब पराली को खाद के रूप में उपयोग कर रहे हैं, जो उनके खेतों को अधिक उपजाऊ बना रहा है।












