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इलाहाबाद हाई कोर्ट: आंतरिक सर्कुलर सार्वजनिक न हों तो परिवार को लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता

On: February 8, 2026
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इलाहाबाद हाई कोर्ट-आंतरिक सर्कुलर सार्वजनिक न हों तो परिवार को लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता
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प्रयागराज, 08 फरवरी 2026। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि बैंक के ऐसे आंतरिक सर्कुलर जो सार्वजनिक रूप से प्रसारित नहीं किए गए हों, उन्हें मृत कर्मचारी के परिवार को अनुग्रह राशि जैसे लाभ से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को निर्देश दिया है कि वह मृतक कर्मचारी के आश्रित के दावे पर तीन महीने के भीतर नए सिरे से विचार कर निर्णय ले।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी सर्कुलर के आधार पर लाभ रोका जा रहा है, तो उसका सार्वजनिक होना या कम से कम संबंधित परिवार को उसकी जानकारी दी जाना आवश्यक है। अन्यथा, वह सर्कुलर बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।

क्या है मामला

याची राजीव मिश्रा ने अपनी माता के निधन के बाद अनुग्रह राशि न मिलने को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। उनकी माता सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत थीं और 7 अक्टूबर 2011 को उनका निधन हो गया था। परिवार ने फरवरी 2013 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। बैंक ने नियुक्ति देने से इनकार करते हुए अनुग्रह राशि के लिए आवेदन करने की सलाह दी।

इसके बाद याची के भाई ने जुलाई 2013 में अनुग्रह राशि के लिए आवेदन किया, जिसे बैंक ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आवेदन मृत्यु के छह महीने के भीतर किया जाना चाहिए था। बैंक ने अपने आंतरिक सर्कुलर का हवाला दिया, जिसकी जानकारी परिवार को कभी नहीं दी गई थी।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने बैंक की कार्यप्रणाली पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब समय-सीमा की शर्त लागू थी, तो बैंक ने स्वयं परिवार को अनुग्रह राशि के लिए आवेदन करने का पत्र क्यों भेजा? इस पर बैंक संतोषजनक उत्तर नहीं दे सका।

अदालत ने स्पष्ट कहा, “जब तक किसी सर्कुलर को सार्वजनिक रूप से प्रसारित न किया जाए या संबंधित परिवार को सूचित न किया जाए, तब तक वह बाध्यकारी नहीं हो सकता।”

परिवार का कोई भी सदस्य कर सकता है दावा

हाई कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि अनुग्रह राशि पूरे परिवार के कल्याण के लिए होती है। इसलिए परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए दावा कर सकता है। केवल इस आधार पर कि आवेदन छह माह की अवधि के बाद किया गया, उसे खारिज करना न्यायसंगत नहीं है—खासतौर पर तब, जब संबंधित शर्तों की जानकारी परिवार को दी ही नहीं गई हो।

अदालत ने बैंक के अस्वीकृति आदेश को रद्द करते हुए तीन महीने में नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी कहा कि यदि किसी अतिरिक्त दस्तावेज की आवश्यकता हो तो 15 दिनों के भीतर परिवार को सूचित किया जाए, ताकि प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबित न रहे।

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