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डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2025 पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CJI सूर्यकांत बोले — “डेटा आज की नई करेंसी है”

On: March 12, 2026
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CJI सूर्यकांत बोले — “डेटा आज की नई करेंसी है”
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नई दिल्ली, Thu, 12 Mar 2026। डिजिटल दौर में तेजी से बढ़ते डेटा के महत्व को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जल्द सुनवाई का आश्वासन दिया है। गुरुवार को हुई प्रारंभिक सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि आज के समय में डेटा केवल सूचना नहीं रहा, बल्कि वह “नई करेंसी” के रूप में उभर चुका है।

अदालत ने मामले की संवेदनशीलता और व्यापक प्रभाव को देखते हुए स्पष्ट किया कि यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और तकनीकी प्रश्न है, जिस पर प्राथमिकता के आधार पर विचार किया जाएगा। अदालत की टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि डिजिटल युग में नागरिकों की निजता, डेटा की सुरक्षा और राज्य की भूमिका जैसे मुद्दे अब न्यायिक विमर्श के केंद्र में हैं।

डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2025 पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि डेटा सुरक्षा का सवाल केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन चुका है। उन्होंने कहा कि जिस तरह आर्थिक व्यवस्था में मुद्रा की अहमियत होती है, उसी तरह आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था में डेटा का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी उल्लेख किया कि बड़ी मात्रा में भारतीय डेटा विदेशों में जा रहा है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी किस प्रकार सुरक्षित रखी जा रही है और उस पर किसका नियंत्रण है। अदालत ने संकेत दिया कि इन पहलुओं पर विस्तृत न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है।

सीजेआई ने यह भी कहा कि यदि किसी बोर्ड या ट्रिब्यूनल के माध्यम से डेटा से जुड़े विवादों का निपटारा किया जाता है, तो उसे अर्ध-न्यायिक निकाय (Quasi-Judicial Body) होना चाहिए और वह न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगा।

याचिकाकर्ताओं ने उठाए कई संवैधानिक सवाल

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत के सामने नए कानून को लेकर कई महत्वपूर्ण आपत्तियां रखीं। उन्होंने कहा कि डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2025 में ‘निजी और व्यक्तिगत डेटा’ की स्पष्ट और ठोस परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे व्याख्या को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

उन्होंने अदालत को बताया कि पहले इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 के तहत यदि किसी व्यक्ति की डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन होता था, तो पीड़ित व्यक्ति सीधे मुआवजे का दावा कर सकता था। लेकिन नए कानून में यह व्यवस्था बदल गई है। अब मुआवजा सीधे पीड़ित व्यक्ति को मिलने के बजाय राज्य या डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को दिया जाएगा।

इंदिरा जयसिंह ने यह भी तर्क दिया कि प्रस्तावित डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड पर किसी स्वतंत्र न्यायिक निगरानी का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठते हैं। उनका कहना था कि जब मामला नागरिकों की निजता और स्वतंत्रता से जुड़ा हो, तो निगरानी तंत्र का मजबूत होना बेहद जरूरी है।

निगरानी, पत्रकारिता और डेटा संप्रभुता पर भी बहस

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने यह भी चिंता जताई कि कानून में सरकार को कुछ विशेष छूट दी गई है, जिससे संभावित रूप से किसी भी डेटा तक सरकारी पहुंच संभव हो सकती है। इससे निगरानी (Surveillance) की आशंका पैदा होती है।

इसके अलावा पत्रकारों को इस कानून के तहत पर्याप्त छूट न दिए जाने का मुद्दा भी उठाया गया। अधिवक्ता ने कहा कि यदि पत्रकारों के लिए स्पष्ट अपवाद (exemptions) नहीं होंगे, तो इससे सूचना के अधिकार और खोजी पत्रकारिता पर असर पड़ सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) का भी उठाया गया। अदालत से आग्रह किया गया कि यह भी जांचा जाए कि भारतीय नागरिकों का डेटा किस सीमा तक विदेशों में संग्रहीत किया जा रहा है और उसे सुरक्षित रखने के लिए क्या व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

डिजिटल युग में निजता की बहस फिर तेज

दरअसल, डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के साथ नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी—जैसे पहचान, वित्तीय विवरण, स्वास्थ्य रिकॉर्ड और ऑनलाइन गतिविधियां—बड़ी मात्रा में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संग्रहित हो रही हैं। ऐसे में डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2025 को देश में डेटा गोपनीयता के लिए एक महत्वपूर्ण कानून माना जा रहा है, लेकिन इसके कई प्रावधानों को लेकर विशेषज्ञों और नागरिक अधिकार समूहों ने सवाल भी उठाए हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी और जल्द सुनवाई का संकेत इस बात को दर्शाता है कि आने वाले समय में डेटा सुरक्षा और निजता से जुड़े कानूनी मानदंडों पर व्यापक न्यायिक बहस देखने को मिल सकती है।

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