नई दिल्ली, 6 मई 2026। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है और न्यायपालिका संसद को कोई विशेष कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून — मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम 2023 — को चुनौती दी गई है। याचिकाओं में कहा गया है कि चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखना संविधान की भावना के खिलाफ है।
क्या है पूरा मामला?
केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक चयन समिति करेगी, जिसमें प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होंगे। इस समिति में CJI को शामिल नहीं किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने Anoop Baranwal vs Union of India मामले में दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में चयन समिति में CJI को शामिल करने का निर्देश दिया था, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष और स्वतंत्र बनी रहे।
हालांकि बुधवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अनूप बरनवाल मामले में दिया गया निर्देश उस समय लागू किया गया था जब इस विषय पर कोई कानून मौजूद नहीं था। कोर्ट ने कहा कि वह व्यवस्था केवल “कानून बनने तक” के लिए अंतरिम व्यवस्था थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि संसद को कानून बनाने का अधिकार संविधान से प्राप्त है और अदालत संसद को यह निर्देश नहीं दे सकती कि वह किस प्रकार का कानून बनाए। कोर्ट ने यह भी पूछा कि यदि संसद ने कानून बना दिया है, तो क्या केवल इस आधार पर उसे असंवैधानिक कहा जा सकता है कि उसमें पहले दिए गए न्यायिक दिशानिर्देशों का अक्षरश: पालन नहीं हुआ?
अदालत ने यह भी कहा कि कानून बनने तक कुछ मानकों का पालन करने की आवश्यकता थी, लेकिन अब संसद ने अधिनियम बना दिया है। ऐसे में इस कानून की संवैधानिक वैधता को अलग आधारों पर परखा जाएगा।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस मांग को स्वीकार नहीं किया, जिसमें मामले की सुनवाई टालने का अनुरोध किया गया था। अदालत ने संकेत दिए कि मामले की संवैधानिक समीक्षा आगे भी जारी रहेगी।
याचिकाकर्ताओं ने उठाए गंभीर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने अदालत में दलील दी कि सुप्रीम Court के फैसले की मूल भावना को साधारण कानून बनाकर खत्म नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया को पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में नहीं छोड़ा जा सकता।
वहीं अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण ने कहा कि मुख्य सवाल यह है कि क्या संसद ऐसा कानून बना सकती है जो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका को लगभग एकाधिकार दे दे। उनका तर्क था कि संविधान पीठ पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि निष्पक्ष चुनाव प्रणाली लोकतंत्र की बुनियादी संरचना का हिस्सा है।
उन्होंने अदालत से कहा कि यदि चयन प्रक्रिया में संतुलन खत्म होता है, तो यह संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत से जुड़ा मुद्दा बन जाता है और ऐसे बदलाव के लिए संवैधानिक संशोधन आवश्यक हो सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
भारत में चुनाव आयोग को लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में माना जाता है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया लंबे समय से बहस का विषय रही है। विपक्षी दलों और कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका की भागीदारी संस्थागत निष्पक्षता को मजबूत करती है।
अब सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई इस बात पर केंद्रित होगी कि नया कानून संविधान के अनुच्छेद 14 और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक अवधारणा की कसौटी पर कितना खरा उतरता है।









