25 जुलाई 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में लागू की गई विवादित ट्रंप टैरिफ नीति को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद अमेरिका अब आयातकों से वसूली गई अरबों डॉलर की राशि वापस कर रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल रिफंड देने से वैश्विक व्यापार जगत का भरोसा वापस नहीं आएगा। उनका मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिसका असर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है।
ट्रंप टैरिफ पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, फिर भी क्यों चिंतित हैं ग्लोबल ट्रेडर्स?
अप्रैल 2025 में ट्रंप प्रशासन ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत कई देशों के आयात पर व्यापक टैरिफ लागू किए थे। भारत पर भी 25 प्रतिशत सामान्य टैरिफ लगाया गया था। इसके अलावा रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क भी लगाया गया।
लेकिन 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से इस नीति को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि कर और सीमा शुल्क लगाने का संवैधानिक अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास।
आयातकों को लौटाए जा रहे 166 अरब डॉलर
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी सरकार आयातकों को लगभग 166 अरब डॉलर छह प्रतिशत ब्याज के साथ वापस कर रही है। रिपोर्टों के अनुसार अब तक करीब 85 अरब डॉलर का भुगतान किया जा चुका है, जबकि शेष राशि चरणबद्ध तरीके से लौटाई जा रही है।
हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने अन्य कानूनी प्रावधानों का सहारा लेते हुए सीमित अवधि के लिए नए टैरिफ लागू करने की रणनीति भी अपनाई है। हाल के महीनों में राष्ट्रीय सुरक्षा, कथित अनुचित व्यापारिक गतिविधियों और बंधुआ मजदूरी से जुड़े आरोपों के आधार पर कई देशों के उत्पादों पर नए शुल्क लगाए गए हैं।
छोटे कारोबारों पर पड़ा सबसे ज्यादा असर
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार ट्रंप टैरिफ का सबसे अधिक असर छोटे और मध्यम उद्योगों पर पड़ा। एक विश्लेषण के मुताबिक, ऐसे कारोबारों को औसतन 3.06 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क वहन करना पड़ा।
कई कंपनियों की पूंजी लंबे समय तक फंसी रही। इससे ऑर्डर रद्द हुए, आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई और कई निवेश योजनाएं टालनी पड़ीं। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ अटलांटा के अनुमान के अनुसार, वित्तीय दबाव झेल रहे कारोबारों को कुल रिफंड में से लगभग 56 अरब डॉलर मिलने की संभावना है, जिससे उन्हें कुछ राहत मिल सकती है।
व्यापारिक भरोसे पर गहरा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार में बढ़ी अनिश्चितता है। यदि कोई भी अमेरिकी प्रशासन अचानक बड़े पैमाने पर टैरिफ लागू कर उन्हें राजनीतिक या कूटनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकता है, तो अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और व्यापारिक साझेदारों का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।
यही वजह है कि कई देश और वैश्विक कंपनियां अब वैकल्पिक बाजारों, नए व्यापारिक साझेदारों और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों की ओर तेजी से ध्यान दे रही हैं ताकि भविष्य में ऐसी नीतिगत अनिश्चितताओं का असर कम किया जा सके।
रिफंड से नहीं लौटेगा तुरंत भरोसा
विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रंप प्रशासन की पहली टैरिफ नीति पर कानूनी रोक जरूर लग गई है, लेकिन इससे वैश्विक व्यापार जगत का खोया विश्वास तुरंत बहाल नहीं होगा। व्यापारिक स्थिरता केवल शुल्क वापस करने से नहीं आती, बल्कि इसके लिए नीतियों में निरंतरता, स्पष्टता और दीर्घकालिक भरोसे की आवश्यकता होती है।
यही कारण है कि अमेरिका द्वारा अरबों डॉलर लौटाए जाने के बावजूद वैश्विक कारोबारी समुदाय अभी भी भविष्य की व्यापारिक नीतियों और संभावित टैरिफ फैसलों को लेकर सतर्क बना हुआ है।











