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रिकवरी एजेंटों के नियमों में ढील, RBI के ड्राफ्ट बदलावों से बैंकों और एजेंसियों को राहत

On: August 8, 2026
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रिकवरी एजेंटों के नियमों में ढील, RBI के ड्राफ्ट बदलावों से
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नई दिल्ली/08 अगस्त 2026: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ऋण वसूली और रिकवरी एजेंटों की नियुक्ति से जुड़े प्रस्तावित नियमों पर मिले फीडबैक के बाद कई प्रावधानों में बदलाव किया है। रिकवरी एजेंटों के नियम में किए गए इन बदलावों से बैंकों और रिकवरी एजेंसियों का अनुपालन बोझ कुछ कम होगा, हालांकि ग्राहकों की निगरानी और शिकायत निवारण को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

रिकवरी एजेंटों के नियमों में क्या बदला?

RBI के हालिया फीडबैक स्टेटमेंट में कई अहम बदलाव किए गए हैं। सबसे बड़ा बदलाव व्यक्तिगत रिकवरी एजेंटों की जानकारी सार्वजनिक करने की बाध्यता से जुड़ा है। अब बैंकों को अपनी वेबसाइट या ऐप पर एजेंसी का नाम, पता, काम की अवधि और कार्यक्षेत्र जैसी जानकारी देनी होगी। प्रत्येक व्यक्तिगत एजेंट का नाम और पता प्रदर्शित करना जरूरी नहीं होगा।

पहले प्रस्तावित व्यवस्था में व्यक्तिगत एजेंटों का विवरण उपलब्ध कराने की बात थी। ऐसे में बदलाव के बाद ग्राहक के लिए यह पता लगाना अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है कि उससे संपर्क करने वाला या घर पहुंचने वाला एजेंट वास्तव में कौन है।

बैकग्राउंड वेरिफिकेशन की प्रक्रिया भी आसान

प्रस्तावित बदलावों में रिकवरी एजेंटों की पृष्ठभूमि जांच को लेकर भी लचीलापन दिया गया है। अब यह जांच केवल रिकवरी एजेंसी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि बैंक भी इसे कर सकता है। डिजिटल रूप से सत्यापित किए जा सकने वाले पहचान और प्राधिकरण दस्तावेजों को भी स्वीकार करने की व्यवस्था की जा रही है।

यह एजेंटों के लिए सुविधा जरूर है, लेकिन जमीनी स्तर पर सवाल यही है कि डिजिटल दस्तावेज की वास्तविकता एक सामान्य ग्राहक कितनी आसानी से जांच पाएगा।

लागू होने की तारीख बढ़ी

RBI ने प्रस्तावित निर्देशों को लागू करने की तारीख 1 अक्टूबर 2026 से बढ़ाकर 1 जनवरी 2027 कर दी है। कुछ मौजूदा रिकवरी एजेंटों को IIBF प्रमाणन पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया गया है। इससे एजेंटों को अचानक काम से बाहर होने की स्थिति से राहत मिल सकती है।

कानूनी फर्मों को भी दायरे से बाहर रखा

RBI ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल कानूनी नोटिस तैयार करने या अदालत में मुकदमे की पैरवी करने वाली कानूनी फर्में रिकवरी एजेंसी की परिभाषा में नहीं आएंगी। इससे ऐसी फर्मों और बैंकों पर अनुपालन का अतिरिक्त बोझ कम होगा।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही जता चुका है सख्त रुख

रिकवरी एजेंटों के व्यवहार को लेकर Supreme Court of India पहले भी कड़ा रुख अपना चुका है। ICICI Bank Ltd. v. Prakash Kaur (2007) मामले में अदालत ने कर्ज वसूली के लिए बलपूर्वक तरीकों और ‘musclemen’ संस्कृति की कड़ी आलोचना की थी। अदालत ने साफ किया था कि बैंक बकाया वसूलने के लिए कानून से बाहर जाकर दबाव नहीं बना सकते।

ऐसे में नए बदलावों से जहां बैंकों और एजेंसियों को व्यावहारिक राहत मिलेगी, वहीं ग्राहक सुरक्षा और रिकवरी एजेंटों की जवाबदेही पर निगरानी बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा।

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