गोरखपुर/28 अगस्त 2026: फिल्मों में युद्ध अक्सर एक नायक के फैसले और कुछ घंटों में पूरी होती कहानी जैसा दिखता है। लेकिन वास्तविक युद्ध की तस्वीर इससे बिल्कुल अलग होती है। बड़े सैन्य अभियानों में फैसले किसी एक व्यक्ति के स्तर पर नहीं लिए जाते, बल्कि संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों के विचार-विमर्श के बाद सामूहिक सहमति से निर्णय होता है। गोरखपुर में जेन अल्फा के बच्चों के साथ संवाद के दौरान एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने युद्ध, सैन्य तैयारी, तकनीक और नेतृत्व से जुड़े कई सवालों के जवाब देकर बच्चों की जिज्ञासा शांत की।
सरस्वती गुरुकुल माथाबारी में गुरुवार को आयोजित संवाद में बच्चों ने वायुसेना प्रमुख से सीधे सवाल किए। बातचीत का दायरा ऑपरेशन सिंदूर से लेकर फाइटर प्लेन उड़ाने, युद्ध के दौरान भावनाओं, नई तकनीक, एयरफोर्स में करियर और अच्छे नेतृत्व की खूबियों तक पहुंचा।
गोरखपुर में एयर चीफ मार्शल ने बच्चों को समझाई युद्ध की असली तस्वीर
श्रद्धा ने पूछा कि ऑपरेशन सिंदूर के बारे में कितना बताया जा सकता है। एयर चीफ मार्शल ने स्पष्ट किया कि किसी सैन्य अभियान से जुड़ी हर जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि सेना हर समय युद्ध के लिए तैयार रहती है और सैनिक ऐसी परिस्थितियों का लगातार अभ्यास करते हैं, जो वास्तविक युद्ध जैसी होती हैं। जरूरत पड़ने पर वही तैयारी काम आती है।
अनन्या ने पूछा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारतीय जवान दुश्मन के इलाके में गए, तब वायुसेना प्रमुख के रूप में उनके मन में क्या चल रहा था। जवाब में उन्होंने कहा कि सैन्य पेशे में हर दिन खतरे के बीच काम करना पड़ता है। लड़ाई के समय व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर देश की सुरक्षा और सौंपे गए लक्ष्य को पूरा करना प्राथमिकता होती है।
पूर्णिमा ने उनसे पूछा कि उन्होंने अब तक कितने युद्ध लीड किए हैं। एयर चीफ मार्शल ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर ही ऐसा अभियान था, जिसे उन्होंने लीड किया।
इसके साथ उन्होंने बच्चों को वास्तविक युद्ध और फिल्मों में दिखाई जाने वाली लड़ाई के बीच का अंतर भी बताया। उनके अनुसार, महत्वपूर्ण सैन्य फैसले अकेले नहीं लिए जाते। सभी संबंधित लोगों के विचार-विमर्श और सहमति के बाद ही बड़े निर्णय होते हैं।
फाइटर प्लेन उड़ाते समय डर क्यों नहीं लगता?
आयुष के सवाल पर कि फाइटर प्लेन उड़ाते समय डर लगता है या नहीं, एयर चीफ मार्शल ने कहा कि पायलटों को इसके लिए व्यापक प्रशिक्षण दिया जाता है। उड़ान के दौरान आने वाली अलग-अलग परिस्थितियों का अभ्यास कराया जाता है, इसलिए प्रशिक्षण उन्हें चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के लिए तैयार करता है।
अरोही ने पूछा कि फाइटर प्लेन उड़ाते समय उनसे कभी गलती हुई है या नहीं। इस पर एयर चीफ मार्शल ने अपने जीवन का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि गलती होने पर उसे सुधारने का तरीका सीखा जाता है। उनके साथ भी ऐसी स्थिति आई थी। एक समय उनका प्रमोशन नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने लक्ष्य नहीं छोड़ा। लगातार प्रयास करते रहे और आज उसी यात्रा का हिस्सा बनकर बच्चों के बीच खड़े हैं।
ओम ने जब पूछा कि विमान उड़ाते समय क्या कभी अपना घर दिखाई देता है, तो एयर चीफ मार्शल ने जवाब दिया कि एक सैनिक के लिए पूरा देश ही उसका घर होता है। उनका यह जवाब बच्चों के लिए शायद सैन्य जीवन की भावना को समझने का सबसे सरल तरीका था।
बदलती तकनीक के साथ वायुसेना भी बदल रही
सुभम ने वायुसेना में बदलती तकनीक को लेकर सवाल किया। एयर चीफ मार्शल ने कहा कि एयरफोर्स भी तकनीकी बदलावों के साथ लगातार खुद को बदल रही है। उनका कहना था कि अगर तकनीक के साथ कदम नहीं मिलाया गया तो दुश्मन का मुकाबला करना मुश्किल होगा। इसलिए नई तकनीक अपनाने के साथ उसके अनुरूप क्षमता विकसित करना भी जरूरी है।
अंशु ने विमान को रखने की जगह के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि विमानों को हैंगर में रखा जाता है। वहां ईंधन भरने के अलावा तकनीकी जांच और रखरखाव का काम भी होता है।
वशिका ने फाइटर प्लेन की डिजाइन चिड़िया जैसी होने की वजह पूछी। एयर चीफ मार्शल ने समझाया कि विमान की बनावट हवा में सुगम और तेज उड़ान को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है। पंखों और विमान के आकार में हवा के दबाव, गति और दूसरे वैज्ञानिक पहलुओं का ध्यान रखा जाता है।
एयरफोर्स में जाने के लिए मेहनत और अभ्यास जरूरी
अविनाश ने पूछा कि एयरफोर्स में शामिल होने के लिए किस तरह पढ़ाई करनी चाहिए। एयर चीफ मार्शल ने कहा कि पहले जरूरी न्यूनतम योग्यता हासिल करनी चाहिए और फिर संबंधित चयन प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए।
उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि एक समय उन्हें अंग्रेजी कम आती थी। एनडीए के प्रशिक्षण के दौरान अंग्रेजी की परीक्षा में वह असफल हुए थे। इसकी जानकारी घर पहुंची तो परिवार चिंतित हुआ, लेकिन करीब छह महीने बाद वह मेडल लेकर लौटे। बच्चों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि अभ्यास करते रहना चाहिए, सफलता जरूर मिलेगी।
श्रेया ने ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के लिए एयरफोर्स में जाने के अवसरों के बारे में पूछा। एयर चीफ मार्शल ने कहा कि गांवों में रहने वाले बच्चों के लिए भी अवसर उपलब्ध हैं। उन्हें पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए, न्यूनतम योग्यता पूरी करनी चाहिए और चयन प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए। चयन होने के बाद वायुसेना आगे का प्रशिक्षण देती है।
अच्छे लीडर की पहचान क्या है?
सुस्मिता ने जब अच्छे नेतृत्व की खूबी पूछी तो एयर चीफ मार्शल का जवाब सीधा लेकिन व्यापक अर्थ वाला था। उन्होंने कहा कि दूसरों से जिस व्यवहार और प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है, उसे पहले खुद पर लागू करना चाहिए।
यानी नेतृत्व केवल दूसरों को निर्देश देने का नाम नहीं है। जिस अनुशासन, व्यवहार और प्रदर्शन की उम्मीद एक नेता अपनी टीम से करता है, उसे पहले खुद उसी कसौटी पर खरा उतरना होगा। तभी प्रभावी नेतृत्व विकसित होता है।
बच्चों की जिज्ञासा में दिखी भविष्य की तैयारी
गोरखपुर में हुआ यह संवाद केवल सवाल-जवाब का कार्यक्रम नहीं रहा। बच्चों के प्रश्नों में युद्ध को समझने की उत्सुकता थी तो दूसरी ओर अपने भविष्य को लेकर व्यावहारिक सवाल भी थे। किसी ने ऑपरेशन सिंदूर के बारे में पूछा, किसी ने फाइटर प्लेन की तकनीक समझनी चाही और किसी ने एयरफोर्स में करियर का रास्ता जानना चाहा।
एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह के जवाबों से बच्चों को सैन्य अभियानों की संवेदनशील जानकारी भले नहीं मिली, लेकिन एक अहम बात जरूर समझ में आई—वास्तविक युद्ध केवल हथियारों और विमानों से नहीं लड़ा जाता। इसके पीछे वर्षों की तैयारी, प्रशिक्षण, तकनीकी क्षमता, अनुशासन और सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता होती है।











