नई दिल्ली/02 नवंबर 2026: न्याय मिलने में देरी और अदालतों में मामलों की सुनवाई को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्यायपालिका को आत्ममंथन करने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि न्याय और अन्याय के बीच का अंतर केवल अंतिम फैसले से तय नहीं होता, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि अदालत ने जरूरत पड़ने पर कितनी तत्परता से हस्तक्षेप किया। सीजेआई ने संवैधानिक अदालतों से अपनी कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने और मामलों की लिस्टिंग को अधिक पारदर्शी व पूर्वानुमान योग्य बनाने पर विचार करने का आग्रह किया।
केरल हाई कोर्ट के प्लेटिनम जुबली समारोह में बोलते हुए उन्होंने न्यायिक व्यवस्था की व्यापक भूमिका, हाई कोर्ट की संवैधानिक शक्तियों और समय पर न्याय सुनिश्चित करने की जरूरत पर विस्तार से बात की।
न्यायपालिका में सुधार: न्याय की शुरुआत और अंत केवल दिल्ली में नहीं
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि भारत में संवैधानिक न्याय की शुरुआत और उसका अंत नई दिल्ली में नहीं होता। देशभर में फैले 25 हाई कोर्ट भारतीय न्यायिक व्यवस्था की मजबूत आधारशिला हैं। प्रत्येक हाई कोर्ट पर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट आम नागरिकों की समस्याओं को बेहतर ढंग से समझने की स्थिति में होते हैं, क्योंकि उनका संपर्क लोगों की रोजमर्रा की वास्तविकताओं से अधिक गहरा होता है।
सीजेआई ने इस संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 226 के महत्व को रेखांकित किया। उनके मुताबिक, हाई कोर्ट की यह संवैधानिक शक्ति न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है।
जहां संविधान का अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 226 हाई कोर्ट को मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए भी रिट और निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
इस व्यापक अधिकार क्षेत्र के कारण हाई कोर्ट कानूनी, वैधानिक, प्रशासनिक और संविदात्मक विवादों में प्रभावी समाधान दे सकते हैं। सीजेआई ने कहा कि जरूरत पड़ने पर समय रहते अंतरिम राहत देने की उनकी शक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
हाई कोर्ट में लंबित मामलों की जल्द सुनवाई पर उठाए सवाल
सीजेआई सूर्यकांत ने एक महत्वपूर्ण संस्थागत चुनौती की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि कई मुकदमों से जुड़े लोग हाई कोर्ट में लंबित मामलों की तत्काल लिस्टिंग या जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रहे हैं।
इस प्रवृत्ति के बीच उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मौजूदा प्रक्रिया में सुधार की कोई गुंजाइश है, खासकर मामलों की लिस्टिंग और प्राथमिकता तय करने के तरीके में।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट हमेशा हाई कोर्ट की संस्थागत स्वायत्तता का सम्मान करता आया है। इसमें हाई कोर्ट को अपना रोस्टर तय करने का अधिकार भी शामिल है। यह सम्मान न्यायिक संस्थाओं की संवैधानिक स्थिति और स्वतंत्रता पर आधारित है।
हालांकि, ऐसे अनुरोधों की लगातार बढ़ती संख्या यह सोचने का अवसर देती है कि न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है।
क्या तकनीक से जरूरी मामलों की जल्द सुनवाई संभव है?
सीजेआई ने न्यायपालिका के सामने कुछ अहम सवाल रखे। उन्होंने कहा कि यह विचार किया जाना चाहिए कि क्या जरूरी मामलों की पहचान अधिक बेहतर तरीके से की जा सकती है और क्या सुनवाई के लिए मामलों को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है।
उन्होंने तकनीक की भूमिका पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, तकनीकी साधनों की मदद से उन मामलों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिनमें देरी से ऐसा नुकसान होने की आशंका हो जिसकी भरपाई संभव न हो।
यह सवाल केवल अदालतों की कार्यक्षमता तक सीमित नहीं है। समय पर सुनवाई कई मामलों में नागरिकों के अधिकारों, उनकी स्वतंत्रता और उनके जीवन से सीधे जुड़ी होती है।
न्यायिक सुधार आलोचना नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी का विषय
सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रियाओं में सुधार से जुड़े सवालों को संस्थागत आलोचना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़े विषय हैं।
उनके संबोधन का मूल संदेश यही रहा कि न्यायपालिका की मजबूती केवल उसके फैसलों से नहीं, बल्कि जरूरतमंद नागरिकों तक समय पर न्याय पहुंचाने की क्षमता से भी मापी जाती है।
मामलों की पारदर्शी लिस्टिंग, सुनवाई में तत्परता और तकनीक का प्रभावी इस्तेमाल न्यायिक व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।













