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सीजेआई सूर्यकांत बोले- समानता की शुरुआत कानून तक समान पहुंच से होती है, न्याय सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए

On: June 25, 2026
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सीजेआई सूर्यकांत बोले- समानता की शुरुआत कानून तक समान पहुंच से होती है
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नई दिल्ली|25 जून 2026: भारत के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत ने कहा है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में वास्तविक समानता की शुरुआत तभी होती है, जब प्रत्येक नागरिक को कानून और न्याय तक समान पहुंच उपलब्ध हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल कानूनी अधिकारों की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि हर व्यक्ति उन अधिकारों का वास्तविक लाभ प्राप्त कर सके।

रूस में आयोजित 14वें सेंट पीटर्सबर्ग अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंच को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्याय व्यवस्था की सफलता इस बात से तय होती है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक कानून की पहुंच कितनी प्रभावी है।

‘सिर्फ कानूनी घोषणा नहीं, अधिकारों का वास्तविक लाभ मिलना चाहिए’

अपने संबोधन में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि कानून तक समान पहुंच केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर नहीं रहनी चाहिए। इसके परिणामस्वरूप नागरिकों को वास्तविक अधिकार और प्रभावी न्याय मिलना चाहिए, न कि केवल कागजों पर दर्ज वैधानिक प्रावधान।

उन्होंने कहा कि हमें यह गंभीरता से विचार करना होगा कि कानून के समक्ष समानता को व्यवहारिक रूप में लागू करने के लिए वास्तव में किन कदमों की आवश्यकता है। उनके अनुसार, दुनिया की सबसे बड़ी और जटिल न्यायिक व्यवस्थाओं में से एक का नेतृत्व करने के अनुभव ने उन्हें यह सिखाया है कि समानता की पहली सीढ़ी न्याय तक समान पहुंच सुनिश्चित करना है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का किया उल्लेख

मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन में समानता की ऐतिहासिक अवधारणा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि समानता की जड़ें केवल वर्ष 1215 के मैग्ना कार्टा तक सीमित नहीं हैं। उनके व्यक्तिगत दृष्टिकोण में इसकी नींव भारतीय परंपरा में भी दिखाई देती है।

उन्होंने कहा कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में चौथी शताब्दी में ही समानता और न्याय के सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है, जो भारतीय चिंतन की समृद्ध विरासत को दर्शाता है।

भारतीय संविधान ने समान न्याय का दिया मजबूत आधार

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि भारतीय संविधान ने देश की स्थापना के साथ नागरिकों को कानून के समक्ष समानता, गरिमापूर्ण जीवन और समान न्याय जैसे मौलिक अधिकार प्रदान किए। हालांकि, इन अधिकारों को व्यवहार में लागू करना सबसे बड़ी चुनौती रही।

उन्होंने कहा कि आर्थिक और सामाजिक विषमताएं, भाषाई विविधता, सांस्कृतिक अंतर तथा भौगोलिक दूरियां न्याय तक पहुंच को कठिन बनाती हैं। इसलिए केवल अधिकार देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन अधिकारों को हर नागरिक तक प्रभावी रूप से पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है।

भौगोलिक और सामाजिक असमानताएं सबसे बड़ी चुनौती

मुख्य न्यायाधीश के अनुसार समानता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा कानूनों की कमी नहीं, बल्कि समाज में मौजूद भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक असमानताएं हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संवैधानिक न्यायालयों ने समय-समय पर संविधान की व्यापक और प्रगतिशील व्याख्या कर इन बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया है।

उनका कहना था कि कानून और न्याय तक पहुंच किसी तकनीकी सुविधा का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का एक मूलभूत और भेदभावरहित सिद्धांत है।

वैश्विक दक्षिण के देशों के सामने अलग तरह की चुनौतियां

अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि वैश्विक पूर्व और वैश्विक दक्षिण के कई देश आज भी अपनी संस्थाओं को मजबूत बनाने, उपनिवेशवाद की विरासत से उबरने और गरीबी जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे देशों पर अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक जांच और दबाव डाला जाता है, जबकि कई समृद्ध और प्रभावशाली देशों के अनुपालन रिकॉर्ड भी हमेशा त्रुटिरहित नहीं रहे हैं। उनके अनुसार वैश्विक कानूनी व्यवस्था में निष्पक्षता और समान मानदंड अपनाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

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