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लंदन में बोले CJI सूर्यकांत – न्याय अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, तभी अदालतें निभाएंगी अपना संवैधानिक दायित्व

On: June 6, 2026
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लंदन में बोले CJI सूर्यकांत - न्याय अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे
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नई दिल्ली|06 जून 2026: लंदन में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था की मूल भावना पर जोर देते हुए कहा कि न्याय तक पहुंच केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालतों का वास्तविक उद्देश्य समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचाना है, जो अपनी आवाज उठाने में सबसे अधिक कठिनाई महसूस करता है।

क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में आयोजित कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि यदि कोई न्यायिक व्यवस्था केवल उन लोगों के अधिकारों की रक्षा कर रही है जो लंबी और महंगी कानूनी लड़ाई लड़ने की क्षमता रखते हैं, तो वह अपने संवैधानिक कर्तव्यों को पूरी तरह पूरा नहीं कर रही है। उनके अनुसार, न्याय की अवधारणा केवल कानून की पुस्तकों या न्यायालयों की दीवारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि आम नागरिक के जीवन में उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए।

न्यायपालिका की सबसे बड़ी पूंजी है जनविश्वास

अपने संबोधन में CJI सूर्यकांत ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका नागरिकों की अंतिम उम्मीद होती है। ऐसे में अदालतों के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह भरोसा किसी संस्था को स्वतः प्राप्त नहीं होता, बल्कि पारदर्शिता, निरंतर सुधार और जवाबदेही के माध्यम से अर्जित करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि अदालतों की असली ताकत उनकी त्रुटिहीन छवि में नहीं, बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार करने, उनसे सीखने और स्वयं को बेहतर बनाने की क्षमता में निहित होती है। यही गुण न्यायपालिका को अन्य संस्थाओं से अलग पहचान देते हैं।

समान राष्ट्रीय न्यायिक नीति की जरूरत पर जोर

CJI सूर्यकांत ने देश में एक समान राष्ट्रीय न्यायिक नीति की आवश्यकता भी रेखांकित की। उनका मानना है कि जब विभिन्न अदालतों की कार्यप्रणाली और न्यायिक दृष्टिकोण में बेहतर समन्वय होगा, तब कानून के शासन के प्रति लोगों का भरोसा और अधिक मजबूत होगा।

उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था में एकरूपता केवल कानूनी प्रक्रिया को सरल नहीं बनाएगी, बल्कि नागरिकों के लिए न्याय प्राप्त करना भी अधिक सहज और भरोसेमंद बनेगा।

तकनीक से मजबूत होगी न्याय तक पहुंच

अपने भाषण में CJI सूर्यकांत ने आधुनिक तकनीक की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि न्याय केवल नियमों का यांत्रिक अनुपालन नहीं है, बल्कि मानवीय परिस्थितियों और सामाजिक वास्तविकताओं को समझते हुए संतुलित निर्णय देना भी उतना ही आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक और आधुनिक न्यायिक प्रणालियों का उपयोग इस तरह किया जाना चाहिए जिससे न्याय तक पहुंच आसान, पारदर्शी और कम खर्चीली बन सके। वर्तमान समय में भारतीय न्यायपालिका के सामने लंबित मामलों की बड़ी संख्या और त्वरित न्याय की आवश्यकता जैसी चुनौतियां मौजूद हैं, जिनसे निपटने में तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

भारत ने विकसित की अपनी स्वदेशी न्यायिक पहचान

CJI सूर्यकांत ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप एक विशिष्ट स्वदेशी न्यायशास्त्र विकसित किया है। यह न्यायिक दृष्टिकोण भारतीय समाज की जटिलताओं और विविध आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित हुआ है।

उन्होंने कहा कि किसी भी न्यायाधीश के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि तब होती है जब अदालत से बाहर निकलने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह महसूस करे कि उसकी बात निष्पक्षता से सुनी गई और उसे सम्मानपूर्वक न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया।

लंदन कार्यक्रम में व्यवधान, भारतीय उच्चायोग ने जताई नाराजगी

ब्रिटेन के छह दिवसीय दौरे पर पहुंचे CJI सूर्यकांत के एक अन्य कार्यक्रम के दौरान कुछ लोगों ने व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिश की, जिससे कुछ समय के लिए असहज स्थिति बन गई। यह कार्यक्रम यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अंतरराष्ट्रीय कानून विषय पर आयोजित किया गया था।

कार्यक्रम के दौरान CJI तकनीक और न्यायशास्त्र के बीच संतुलन, न्यायिक प्रक्रियाओं में AI की संभावनाओं और उससे जुड़ी चुनौतियों पर अपने विचार रख रहे थे। घटना के बाद भारतीय उच्चायोग ने इस व्यवहार की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि इस प्रकार की गतिविधियां सार्वजनिक संवाद और शैक्षणिक चर्चा की मूल भावना के विपरीत हैं।

निष्कर्ष

लंदन में दिए गए अपने संबोधन के माध्यम से CJI सूर्यकांत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की सफलता केवल फैसलों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि न्याय तक पहुंच समाज के हर वर्ग, विशेषकर कमजोर और वंचित लोगों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रही है। उनका संदेश यह था कि न्याय तभी सार्थक है जब वह हर नागरिक के लिए समान रूप से उपलब्ध और सुलभ हो।

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