नई दिल्ली|20 जुलाई 2026: करीब 18 साल पहले तेजस लड़ाकू विमान कार्यक्रम से अलग कर दिए गए कावेरी इंजन प्रोजेक्ट ने एक बार फिर नई उम्मीद जगाई है। स्वदेशी रक्षा तकनीक को मजबूत बनाने की दिशा में भारत ने इस परियोजना को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। हाल ही में कावेरी इंजन के सफल फुल-आफ्टरबर्नर परीक्षण और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से वैज्ञानिकों को अगले पांच से सात वर्षों में छठी पीढ़ी का फाइटर इंजन विकसित करने का लक्ष्य दिए जाने के बाद यह परियोजना फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही मूल कावेरी इंजन भारतीय वायुसेना की तत्कालीन जरूरतों को पूरा नहीं कर पाया था, लेकिन इस परियोजना से विकसित तकनीक भविष्य के कई स्वदेशी रक्षा प्लेटफॉर्म की आधारशिला बन सकती है।
रक्षा मंत्री ने वैज्ञानिकों को दिया समयबद्ध लक्ष्य
इस वर्ष फरवरी में बेंगलुरु स्थित डीआरडीओ के गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) के दौरे के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वैज्ञानिकों से एयरो-इंजन तकनीक में तेजी लाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जिन तकनीकों को विकसित करने में दुनिया के विकसित देशों को 25 से 30 वर्ष लगते हैं, भारत को अब उसी अनुभव का लाभ उठाकर अगले पांच से सात वर्षों में नई पीढ़ी के इंजन तैयार करने होंगे।
उन्होंने केवल पांचवीं पीढ़ी तक सीमित न रहकर सीधे छठी पीढ़ी के फाइटर इंजन पर काम करने की बात कही। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग और अत्याधुनिक सामग्रियों के उपयोग पर विशेष जोर दिया गया। इसी दौरान कावेरी इंजन के फुल-आफ्टरबर्नर परीक्षण का सफल प्रदर्शन भी किया गया।
81 से 83 किलोन्यूटन थ्रस्ट का लक्ष्य
डीआरडीओ और ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सहयोग से विकसित किए जा रहे कावेरी इंजन के उन्नत संस्करण का लक्ष्य लगभग 81 से 83 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट हासिल करना है। यह क्षमता भविष्य के एडवांस्ड लड़ाकू विमानों की आवश्यकताओं के काफी करीब मानी जा रही है।
यदि यह लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल होता है, तो भारत को स्वदेशी सैन्य विमान इंजन तकनीक में बड़ी उपलब्धि मिलेगी और विदेशी इंजनों पर निर्भरता भी कम होगी।
1989 में शुरू हुई थी कावेरी इंजन परियोजना
कावेरी इंजन कार्यक्रम को वर्ष 1989 में मंजूरी दी गई थी। इसका उद्देश्य तेजस हल्के लड़ाकू विमान (LCA) के लिए स्वदेशी आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन विकसित करना था। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) के नेतृत्व में शुरू हुई इस परियोजना की प्रारंभिक लागत लगभग 382 करोड़ रुपये निर्धारित की गई थी।
हालांकि, विकास के दौरान कई तकनीकी चुनौतियां सामने आईं। भारतीय वायुसेना को तेजस के लिए 83 से 85 kN थ्रस्ट की आवश्यकता थी, जबकि कावेरी इंजन लगभग 70 से 72 kN थ्रस्ट ही उत्पन्न कर पाया। इसके अलावा इंजन का वजन निर्धारित लक्ष्य से लगभग 150 किलोग्राम अधिक था। टर्बाइन ब्लेड, इंजन कंट्रोल सिस्टम और अन्य तकनीकी पहलुओं में भी सुधार की जरूरत बनी रही।
प्रतिबंध और परीक्षण सुविधाओं की कमी बनी बड़ी बाधा
1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर भी इस परियोजना पर पड़ा। अत्याधुनिक तकनीक और आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता सीमित हो गई। साथ ही देश में हाई-ऑल्टिट्यूड इंजन परीक्षण सुविधा का अभाव भी विकास की गति को प्रभावित करता रहा। आखिरकार वर्ष 2008 में कावेरी इंजन को तेजस कार्यक्रम से आधिकारिक रूप से अलग कर दिया गया।
अब कई रक्षा परियोजनाओं की बनेगी तकनीकी नींव
तेजस कार्यक्रम से अलग होने के बावजूद कावेरी इंजन परियोजना बंद नहीं हुई। समय के साथ इसे नए स्वरूप में विकसित किया गया। इसका ‘ड्राई कावेरी’ संस्करण डीआरडीओ के स्टेल्थ मानव रहित लड़ाकू विमान (UCAV) कार्यक्रम के लिए तैयार किया जा रहा है। यह बिना आफ्टरबर्नर के 49 से 51 kN थ्रस्ट उत्पन्न करता है और इसका ऊंचाई परीक्षण रूस में पूरा हो चुका है।
वहीं, कावेरी 2.0 नाम से विकसित हो रहे आफ्टरबर्निंग संस्करण का लक्ष्य 81 से 83 kN थ्रस्ट प्राप्त करना है। इसके अलावा इसी तकनीक के आधार पर विकसित कावेरी मरीन गैस टर्बाइन ने विशाखापत्तनम में नौसेना परीक्षणों के दौरान लगभग 12 मेगावाट (करीब 16,000 हॉर्सपावर) की प्रणोदन क्षमता का सफल प्रदर्शन किया है।
रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम पड़ाव
विशेषज्ञों का मानना है कि कावेरी इंजन परियोजना केवल एक इंजन कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की स्वदेशी एयरो-इंजन तकनीक विकसित करने की दीर्घकालिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि इसका उन्नत संस्करण निर्धारित मानकों पर सफल होता है, तो भविष्य के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA), स्टेल्थ ड्रोन और अन्य रक्षा प्लेटफॉर्म को स्वदेशी शक्ति मिल सकेगी। इससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को भी रक्षा क्षेत्र में नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।












