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Make in India: दुनिया के बाजार तक पहुंचें भारतीय उत्पाद, MSME के लिए राजनाथ सिंह ने गिनाए बड़े अवसर

On: September 1, 2026
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Make in India, MSME के लिए राजनाथ सिंह ने गिनाए बड़े अवसर
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नई दिल्ली, 01 सितंबर 2026। भारत में उत्पादन बढ़ाने की नीति अब केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित रखने के बजाय वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की मजबूत मौजूदगी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को ग्रेटर नोएडा में एक एमएसएमई कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि भारत को Make in India, Make for India और Make for the World के सिद्धांत पर आगे बढ़ना होगा।

रक्षा मंत्री के मुताबिक, दुनिया में बदलती आपूर्ति शृंखलाओं और भरोसेमंद विनिर्माण साझेदारों की तलाश भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए बड़ा अवसर लेकर आई है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि देश में कितना उत्पादन हो रहा है, बल्कि यह भी है कि भारतीय कंपनियां अपने उत्पादों को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाकर दुनिया के बाजार में कितनी मजबूती से उतार पाती हैं।

Make in India से आगे बढ़कर Make for the World पर जोर

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय विनिर्माण नीति की दिशा अब व्यापक होनी चाहिए। Make in India के जरिए देश में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ भारतीय उद्योगों को देश की जरूरतें पूरी करने और फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए उत्पाद तैयार करने पर ध्यान देना होगा।

उन्होंने कहा कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बदलाव के बीच कई देश ऐसे विनिर्माण साझेदार तलाश रहे हैं, जिन पर भरोसा किया जा सके। भारत के एमएसएमई इस बदलते परिदृश्य का लाभ उठा सकते हैं।

हालांकि, वैश्विक बाजार में जगह बनाना केवल उत्पादन बढ़ाने से संभव नहीं होगा। गुणवत्ता, कीमत, समय पर आपूर्ति, तकनीकी क्षमता और भरोसेमंद सेवा—इन सभी मोर्चों पर भारतीय कंपनियों को खुद को साबित करना होगा।

MSME को शोध और तकनीक में निवेश क्यों बढ़ाना होगा?

रक्षा मंत्री ने एमएसएमई को अपने कारोबार का एक हिस्सा शोध, विकास और तकनीकी क्षमता बढ़ाने पर खर्च करने की सलाह दी। उनका कहना था कि आने वाले समय में वही उद्योग प्रतिस्पर्धा में टिक पाएंगे, जो लगातार नए उत्पाद और बेहतर तकनीक विकसित करने की क्षमता रखते हों।

इसके लिए छोटे उद्योगों को विश्वविद्यालयों, आईआईटी, शोध संस्थानों, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप और बड़े उद्योगों के साथ सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।

यह साझेदारी एमएसएमई के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अत्याधुनिक तकनीक पर अकेले निवेश करना छोटे उद्योगों के लिए मुश्किल हो सकता है। संस्थानों और बड़े उद्योगों के साथ मिलकर काम करने से शोध की लागत, विशेषज्ञता और तकनीकी संसाधनों तक पहुंच आसान हो सकती है।

व्यापार समझौतों से एमएसएमई को कैसे मिलेगा फायदा?

राजनाथ सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार विभिन्न देशों और क्षेत्रों के साथ व्यापार संबंध मजबूत करने के लिए मुक्त व्यापार समझौतों पर काम कर रही है। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ओमान, स्विट्जरलैंड और यूरोपीय संघ का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे समझौतों से भारतीय उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

एमएसएमई के सामने सबसे बड़ी चुनौती अक्सर यह होती है कि वे घरेलू स्तर पर मजबूत होने के बावजूद निर्यात के लिए जरूरी नेटवर्क, वित्त और बाजार की जानकारी में पीछे रह जाते हैं। ऐसे में व्यापार समझौतों से मिलने वाली संभावनाओं का फायदा उठाने के लिए उन्हें अपने उत्पादों, प्रमाणन और निर्यात क्षमता को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करना होगा।

रक्षा मंत्री ने क्रेडिट गारंटी के विस्तार और जीएसटी को तर्कसंगत बनाने जैसे सरकारी कदमों का लाभ उठाने की भी अपील की। उनका जोर इस बात पर रहा कि सरकारी नीतियों से बने अवसरों को वास्तविक कारोबारी विस्तार में बदला जाए।

देश में MSME की संख्या करीब आठ करोड़ पहुंची

राजनाथ सिंह के अनुसार, देश में एमएसएमई की संख्या वर्ष 2012-13 में करीब 4.67 करोड़ थी, जो अब लगभग आठ करोड़ हो गई है। यह विस्तार बताता है कि छोटे और मध्यम उद्यम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कितने महत्वपूर्ण हो चुके हैं।

अब चुनौती इस संख्या को आर्थिक ताकत में बदलने की है। सरकार के विकसित भारत@2047 के लक्ष्य में एमएसएमई की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये उद्योग न केवल उत्पादन और निर्यात बढ़ा सकते हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के बड़े अवसर भी पैदा करते हैं।

ड्रोन से क्वांटम तकनीक तक नए अवसर

रक्षा मंत्री ने एमएसएमई के लिए कई उभरते क्षेत्रों की ओर ध्यान दिलाया। इनमें ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, साइबर सुरक्षा, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, स्वायत्त प्रणालियां, उन्नत सामग्री, अंतरिक्ष और क्वांटम तकनीक प्रमुख हैं।

इन क्षेत्रों में अवसर का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। खासकर रक्षा, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में छोटे उद्योग बड़े सिस्टम का हिस्सा बनकर काम कर सकते हैं। इससे उन्हें केवल घरेलू आपूर्ति तक सीमित रहने के बजाय वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में शामिल होने का रास्ता मिल सकता है।

भारत के लिए इसका एक बड़ा लाभ रोजगार के स्तर पर भी हो सकता है। तकनीक आधारित एमएसएमई के विस्तार से इंजीनियरिंग, डिजाइन, सॉफ्टवेयर, विनिर्माण और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में कुशल युवाओं के लिए नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

रक्षा क्षेत्र में गुणवत्ता और भरोसे पर कोई समझौता नहीं

रक्षा क्षेत्र का उल्लेख करते हुए राजनाथ सिंह ने गुणवत्ता और विश्वसनीयता को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि रक्षा उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले प्रत्येक हिस्से की गुणवत्ता सीधे सशस्त्र बलों की कार्यक्षमता से जुड़ी होती है।

यही कारण है कि रक्षा क्षेत्र में एमएसएमई के लिए केवल कम लागत पर उत्पाद तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें लंबे समय तक भरोसेमंद प्रदर्शन, तकनीकी मानकों और निरंतर गुणवत्ता बनाए रखने की क्षमता विकसित करनी होगी।

भारत जिस आत्मनिर्भर रक्षा विनिर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें एमएसएमई की भूमिका सप्लाई चेन के स्तर पर भी अहम हो सकती है। छोटे उद्योग बड़े रक्षा निर्माताओं और परियोजनाओं के लिए विशेष पुर्जे, तकनीकी समाधान और उन्नत प्रणालियां उपलब्ध करा सकते हैं।

क्या भारतीय छोटे उद्योग वैश्विक बाजार के लिए तैयार हैं?

राजनाथ सिंह की अपील के पीछे असल चुनौती यही है। भारत के एमएसएमई की संख्या और घरेलू पहुंच बड़ी है, लेकिन वैश्विक बाजार में टिकाऊ सफलता के लिए उत्पादन क्षमता से आगे बढ़कर तकनीक, गुणवत्ता, ब्रांडिंग, निर्यात नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन पर लगातार निवेश करना होगा।

दुनिया की कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को अधिक विविध और भरोसेमंद बनाने की कोशिश कर रही हैं। भारत के लिए यह मौका है, लेकिन मौका अपने आप बाजार में हिस्सेदारी में नहीं बदलेगा। इसके लिए भारतीय एमएसएमई को गुणवत्ता और नवाचार को अपनी कारोबारी रणनीति के केंद्र में रखना होगा।

रक्षा मंत्री का संदेश इसी बदलाव की ओर संकेत करता है—भारत में बनाना पहला कदम है, लेकिन दुनिया के बाजार में भारतीय उत्पादों को भरोसे के साथ स्थापित करना अगली बड़ी मंजिल है।

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