नई दिल्ली/18 जुलाई 2026: देश में मानसून में ब्रेक का असर अब केवल मौसम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव खेती-किसानी पर दिखाई देने लगा है। जुलाई के मध्य तक उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के कई मैदानी इलाकों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार बारिश में आई लंबी रुकावट सामान्य मानसूनी ब्रेक जैसी नहीं है, बल्कि इसके पीछे एलनीनो (El Niño) का मजबूत प्रभाव माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो इसका असर केवल खरीफ सीजन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रबी फसलों और अगले वर्ष की शुरुआत तक भी मौसम का मिजाज प्रभावित हो सकता है। ऐसे में किसानों के साथ-साथ कृषि अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
मानसून में ब्रेक के पीछे एलनीनो का बढ़ता प्रभाव
मौसम एजेंसी इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन इंफॉर्मेशन सर्विसेज (INCOIS) के ताजा आकलन के अनुसार जुलाई 2026 से मार्च 2027 के बीच एलनीनो की स्थिति बने रहने की संभावना 85 से 98 प्रतिशत के बीच है। इसका संकेत है कि आने वाले महीनों में भी मौसम सामान्य से अलग रह सकता है।
एलनीनो के दौरान प्रशांत महासागर के सतही जल का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। इसका असर वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण पर पड़ता है और भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून को ऊर्जा देने वाली समुद्री प्रणालियां कमजोर पड़ने लगती हैं। यही कारण है कि इस बार मानसूनी गतिविधियां अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही हैं।
हालांकि मौसम वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जुलाई के अंतिम सप्ताह या अगस्त के पहले सप्ताह में इंडियन ओशन डायपोल (IOD) विकसित होने पर कुछ राहत मिल सकती है। यदि यह अनुकूल स्थिति बनती है तो मानसून दोबारा सक्रिय हो सकता है।
बारिश क्यों पड़ गई धीमी?
आमतौर पर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले निम्न दबाव के क्षेत्र (लो-प्रेशर सिस्टम) मानसून को मजबूती देते हैं। लेकिन इस वर्ष दोनों समुद्री क्षेत्रों में ऐसे मौसमी तंत्र अपेक्षित संख्या और तीव्रता के साथ विकसित नहीं हो सके हैं।
इसके अलावा एलनीनो के कारण नमी लेकर आने वाली हवाएं भी कमजोर हो गई हैं। जब वातावरण में पर्याप्त नमी नहीं पहुंचती तो बादलों का विकास धीमा पड़ जाता है और लंबे समय तक बारिश का सिलसिला थम जाता है। यही वजह है कि देश के बड़े हिस्से में मानसून सुस्त बना हुआ है।
खरीफ के बाद रबी फसलों पर भी मंडरा सकता है संकट
जुलाई और अगस्त का समय खरीफ फसलों की बुआई और शुरुआती बढ़वार के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि इसी दौरान पर्याप्त बारिश नहीं होती तो धान, दालें, तिलहन और अन्य वर्षा आधारित फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि एलनीनो का प्रभाव मार्च 2027 तक बना रहता है तो मिट्टी में नमी की कमी और जल स्रोतों पर दबाव के कारण रबी सीजन की फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं। इससे कृषि उत्पादन और किसानों की आय दोनों पर असर पड़ने की आशंका है।
पूर्व में अधिक बारिश, पश्चिमी भारत में सूखे जैसे हालात
इस बार मानसून का वितरण भी असमान बना हुआ है। देश के पूर्वी हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई है, जबकि पश्चिम और उत्तर-पश्चिम भारत के कई क्षेत्रों में बारिश का गंभीर अभाव देखा जा रहा है।
कई जिलों में वर्षा की कमी 30 से 40 प्रतिशत तक दर्ज की गई है, जबकि कुछ इलाकों में यह कमी 50 से 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है। लगातार कम होती बारिश के कारण खेतों की नमी घट रही है और वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है।
कृषि, जलाशयों और महंगाई पर भी पड़ सकता है असर
मौसम विभाग के अनुसार फिलहाल मानसून ट्रफ ऐसी स्थिति में है जो व्यापक वर्षा के लिए अनुकूल नहीं मानी जा रही। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यदि एलनीनो का प्रभाव 2015-16 की तरह लंबे समय तक कायम रहता है तो इसका असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा।
कम वर्षा से जलाशयों में पानी का स्तर घट सकता है, सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और कृषि उत्पादन में कमी आने पर खाद्यान्नों की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह मानसून और कृषि दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।










