नई दिल्ली|06 जून 2026: उद्देश्य यह आकलन करना था कि पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता का भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, मुद्रा बाजार और आम नागरिकों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है तथा उससे निपटने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए जाने चाहिए।
प्रधानमंत्री ने बैठक में स्पष्ट किया कि सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि वैश्विक परिस्थितियों का नकारात्मक असर आम लोगों के जीवन पर न्यूनतम रहे। उन्होंने आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक गतिविधियों को सुचारु बनाए रखने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करने पर जोर दिया।
आर्थिक सलाहकार परिषद ने पेश किया विस्तृत आकलन
सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्यों ने प्रधानमंत्री के समक्ष एक विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया। इसमें पश्चिम एशिया संकट के भारत सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभावों का विश्लेषण किया गया।
विशेष रूप से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में संभावित उतार-चढ़ाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर, विदेशी निवेश की स्थिति और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि यदि संकट लंबा खिंचता है तो इसका असर ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर अधिक पड़ सकता है, जिनमें भारत भी शामिल है।
रुपये पर दबाव और ऊर्जा आपूर्ति पर हुई चर्चा
बैठक में डॉलर के मुकाबले रुपये पर बढ़ते दबाव को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। इस दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए उठाए गए कदमों की समीक्षा की गई।
जानकारों ने सुझाव दिया कि भारत को ऊर्जा आपूर्ति के लिए किसी एक क्षेत्र या सीमित देशों पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी होगी। इसके लिए कच्चे तेल और गैस की खरीद के स्रोतों में विविधता लाने पर बल दिया गया, ताकि किसी क्षेत्रीय संकट का सीधा असर देश की ऊर्जा जरूरतों पर न पड़े।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में दीर्घकालिक रणनीति पर जोर
बैठक में ऊर्जा क्षेत्र को लेकर दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि भारत को सौर ऊर्जा, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा, एथेनॉल और हरित हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को और तेजी से बढ़ावा देना चाहिए।
माना गया कि ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक सुरक्षा ही नहीं बल्कि रणनीतिक मजबूती का भी आधार बनेगी। आने वाले वर्षों में स्वच्छ और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों में निवेश बढ़ाकर भारत वैश्विक ऊर्जा संकटों के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकता है।
विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग रणनीति बनाने के निर्देश
प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक में मौजूद अधिकारियों और विशेषज्ञों से कहा कि अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों पर संकट के प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण किया जाए। उन्होंने उद्योग, परिवहन, कृषि, निर्यात और ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए अलग-अलग कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता बताई।
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार आवश्यक सुधारों और नीतिगत फैसलों के लिए पूरी तरह तैयार है। उनका जोर इस बात पर रहा कि वैश्विक परिस्थितियां चाहे जैसी हों, देश के नागरिकों और कारोबारियों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
आरबीआई के कदमों से रुपये को मिला सहारा
गौरतलब है कि हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने और वित्तीय बाजारों में स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इन उपायों के बाद रुपये में मजबूती के संकेत भी देखने को मिले हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते किए गए ये प्रयास भारत को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं से बेहतर तरीके से निपटने में मदद कर सकते हैं।
बैठक में आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्यों के अलावा प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा और प्रधान सचिव शक्तिकांत दास भी मौजूद रहे। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में सरकार ऊर्जा सुरक्षा, निवेश और आर्थिक स्थिरता को लेकर कुछ और महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती है।










