लखनऊ, 23 अप्रैल 2026 (गुरुवार)। साहित्य और संस्कृति के संगम की एक दुर्लभ झलक राजधानी लखनऊ में देखने को मिलने वाली है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी रचना रश्मिरथी के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर ‘रश्मिरथी पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है। यह तीन दिवसीय भव्य आयोजन 24 से 26 अप्रैल तक इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में होगा, जिसका शुभारंभ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को करेंगे।
इस आयोजन में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद रहेंगे। कार्यक्रम केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्रचिंतन, सांस्कृतिक चेतना और प्रेरणा का जीवंत मंच बनने जा रहा है।
रश्मिरथी पर्व: उद्घाटन दिन पर राष्ट्रीय विमर्श और नाट्य प्रस्तुति
24 अप्रैल को ‘रश्मिरथी पर्व’ का आगाज़ एक गरिमामय उद्घाटन सत्र से होगा। इस दौरान रश्मिरथी संवाद स्मारिका का लोकार्पण किया जाएगा। इसके बाद राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित होगा, जहां देशभर से आए विद्वान दिनकर के साहित्य, उनके राष्ट्रवादी दृष्टिकोण और आज के समय में उनकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
शाम ढलते ही मंच पर रश्मिरथी पर आधारित नाटक का मंचन होगा। यह प्रस्तुति केवल एक नाट्य अनुभव नहीं, बल्कि महाभारत के कर्ण के माध्यम से संघर्ष, स्वाभिमान और नैतिक द्वंद्व की गहराइयों को छूने का प्रयास होगी।
विवेकानंद के विचारों से युवाओं को जोड़ने की पहल
25 अप्रैल का दिन युवा चेतना और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को समर्पित रहेगा। इस दिन स्वामी विवेकानंद के सांस्कृतिक भारत निर्माण में योगदान पर विशेष परिसंवाद होगा।
विचार-विमर्श का केंद्र होगा—आत्मविश्वास, राष्ट्रसेवा और आध्यात्मिक जागरूकता। शाम को विवेकानंद के जीवन पर आधारित नाट्य प्रस्तुति होगी, जो युवाओं के भीतर छिपी संभावनाओं को जगाने का संदेश देगी।
अटल और तिलक को समर्पित होगा समापन दिवस
26 अप्रैल को ‘रश्मिरथी पर्व’ का अंतिम दिन राष्ट्र निर्माण के महानायकों को समर्पित रहेगा। इस दिन बाल गंगाधर तिलक और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के योगदान पर विशेष चर्चा होगी।
इसके साथ ही अटल स्वरांजलि के तहत अटल जी की कविताओं पर आधारित संगीतमय नृत्य नाटिका प्रस्तुत की जाएगी, जबकि लोकमान्य तिलक के जीवन पर आधारित नाटक भी मंचित होगा।
पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह के अनुसार, यह आयोजन युवाओं में राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान और सामाजिक समरसता की भावना को मजबूत करेगा।
साहित्य से संस्कृति तक: एक संदेश, कई आयाम
‘रश्मिरथी पर्व’ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार है—जो बताता है कि विकास के साथ-साथ विरासत का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। लखनऊ की धरती पर यह उत्सव उस सांस्कृतिक निरंतरता को रेखांकित करता है, जहां अतीत की आवाजें वर्तमान को दिशा देती हैं।
यह आयोजन कहीं न कहीं यह भी संकेत देता है कि डिजिटल युग में भी साहित्य की प्रासंगिकता कम नहीं हुई, बल्कि वह नए रूप में समाज को जोड़ने का माध्यम बन रहा है।








