नई दिल्ली/9 जुलाई 2026। सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की सीमाओं और अश्लीलता की कानूनी परिभाषा को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ गाली-गलौज, अपमानजनक या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अपने आप में अश्लीलता का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी अभिव्यक्ति को अश्लील तभी माना जाएगा, जब उसमें कामुक तत्व हो, वह कामुकता को बढ़ावा देती हो और समाज के नैतिक आचरण को दूषित करने की क्षमता रखती हो।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अभद्र भाषा और अश्लीलता एक जैसी नहीं
मुख्य कीवर्ड: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ता ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें निचली अदालत द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 294 के तहत सुनाई गई सजा को बरकरार रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा अपमानजनक या अशोभनीय शब्दों का प्रयोग, भले ही वह सामाजिक दृष्टि से अनुचित हो, लेकिन केवल इसी आधार पर उसे अश्लीलता का अपराध नहीं माना जा सकता।
अश्लीलता तय करने के लिए क्या है कानूनी कसौटी?
पीठ ने कहा कि किसी कथन या अभिव्यक्ति को अश्लील मानने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि उसमें कामुकता का तत्व मौजूद हो, वह यौन उत्तेजना या कामुक प्रवृत्ति को बढ़ावा देता हो और उसे देखने या सुनने वालों के नैतिक मूल्यों को प्रभावित या भ्रष्ट करने की क्षमता रखता हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल अभद्र या असभ्य भाषा का प्रयोग आईपीसी की धारा 294 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सार्वजनिक स्थान पर लोगों को परेशानी होना भी जरूरी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में ऐसा कोई आरोप नहीं था कि कथित शब्दों के इस्तेमाल से सार्वजनिक स्थान पर मौजूद अन्य लोगों को असुविधा या परेशानी हुई हो। जबकि आईपीसी की धारा 294 लागू होने के लिए यह एक आवश्यक तत्व है।
पीठ ने कहा कि यदि शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों को पहली नजर में सही भी मान लिया जाए, तब भी वे धारा 294 के तहत अश्लीलता की कानूनी परिभाषा को पूरा नहीं करते। इसलिए इस प्रावधान के तहत अपराध नहीं बनता।
जमीन विवाद से जुड़ा था पूरा मामला
यह मामला अगस्त 2017 में तमिलनाडु में कृषि भूमि के विवाद से जुड़ा था। पहले याचिकाकर्ता और उसके साले के बीच विवाद हुआ था। इसके दो दिन बाद उसी जमीन को लेकर शिकायतकर्ता के भतीजे से भी कहासुनी हुई।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि जब शिकायतकर्ता बीच-बचाव के लिए पहुंचा तो याचिकाकर्ता ने उसे कथित तौर पर अभद्र गालियां दीं और जातिसूचक टिप्पणियां कीं।
निचली अदालत और हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
निचली अदालत ने याचिकाकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 294(बी) (अश्लील कृत्य एवं शब्द), धारा 326 (गंभीर चोट पहुंचाना) और धारा 506(2) (आपराधिक धमकी) के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था।
बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने एससी/एसटी अधिनियम से जुड़े आरोपों में याचिकाकर्ता को राहत देते हुए बरी कर दिया, लेकिन आईपीसी की अन्य धाराओं के तहत दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा था।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून की नजर में केवल अपमानजनक या अभद्र भाषा का इस्तेमाल स्वतः अश्लीलता की श्रेणी में नहीं आता। अश्लीलता सिद्ध करने के लिए कानूनी मानकों और परिस्थितियों की कसौटी पर हर मामले का अलग-अलग परीक्षण करना आवश्यक होगा।











