नई दिल्ली (06 नवंबर 2026)। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि संविधान के प्रावधानों के सामने कोई भी कानून या नियम सर्वोपरि नहीं हो सकता। यदि एनडीपीएस एक्ट, यूएपीए और पीएमएलए जैसे विशेष कानूनों के प्रावधानों का टकराव संविधान से होता है, तो संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जाएगी। अदालत ने कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकार का अहम हिस्सा है। मुकदमे में अनुचित देरी होने पर जमानत देने के लिए इस अधिकार को आधार बनाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने गुरुवार, 5 नवंबर को Sujit Das बनाम Union of India मामले में यह टिप्पणी की। अदालत ने विशेष कानूनों के तहत जमानत की सख्त शर्तों और आरोपी के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर अहम सवाल उठाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट: त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल संवैधानिक अधिकार भर नहीं है, बल्कि यह मौलिक अधिकार है। भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र में जीवन और स्वतंत्रता का विशेष स्थान है। ऐसे अधिकारों के साथ हल्के ढंग से समझौता नहीं किया जा सकता, भले ही मामला किसी विशेष कानून के तहत क्यों न हो।
पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखने और उसके मुकदमे की सुनवाई में लगातार देरी होने की स्थिति में संवैधानिक अदालतें जमानत पर विचार कर सकती हैं। यह अधिकार केवल इसलिए सीमित नहीं हो सकता कि संबंधित अपराध किसी सख्त कानून के तहत दर्ज किया गया है।
अदालत की यह टिप्पणी उन मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां आरोपी लंबे समय से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद हैं और मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है।
NDPS एक्ट की धारा 37 पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के एक फैसले में की गई टिप्पणियों पर असहमति जताई। उस फैसले में कहा गया था कि एनडीपीएस एक्ट जैसे विशेष कानूनों के तहत आरोपी को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत त्वरित सुनवाई के अधिकार का इस्तेमाल धारा 37 की सख्त जमानत शर्तों के दायरे में ही करना होगा।
इस व्यवस्था के अनुसार, केवल मुकदमे में देरी के आधार पर एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 की शर्तों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों की संवैधानिक शक्ति को किसी विशेष कानून के प्रावधानों के अधीन नहीं किया जा सकता। अदालत ने पूर्व के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के उल्लंघन की स्थिति में विशेष कानूनों के कठोर प्रावधानों को संवैधानिक अधिकारों के सामने प्रभावी नहीं माना जा सकता।
कानून की व्याख्या संविधान के आधार पर होनी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संवैधानिक व्याख्या के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराया। अदालत के मुताबिक, संविधान की व्याख्या किसी कानून के आधार पर नहीं की जानी चाहिए, बल्कि कानूनों की व्याख्या संविधान के अनुरूप होनी चाहिए।
कोई भी कानून, चाहे वह सामान्य हो या विशेष, संविधान की व्याख्या का आधार नहीं बन सकता। इसके उलट, कानूनों को इस तरह समझा जाना चाहिए कि वे मौलिक अधिकारों के उद्देश्य और भावना को आगे बढ़ाएं।
यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया में संविधान की सर्वोच्चता को रेखांकित करती है। खासतौर पर उन मामलों में, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की ओर से लागू किए गए कठोर कानूनी प्रावधान आमने-सामने होते हैं।
NDPS, UAPA और PMLA मामलों में जमानत पर बड़ी पीठ करेगी विचार
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामलों में सुनवाई में देरी के आधार पर जमानत देने को लेकर शीर्ष अदालत के भीतर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।
एनडीपीएस एक्ट, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA और धन शोधन निवारण अधिनियम यानी PMLA के मामलों में जमानत की कठोर शर्तों तथा अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले त्वरित सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर न्यायिक मतभेद रहे हैं।
कुछ फैसलों में विशेष कानूनों की जमानत संबंधी शर्तों को प्राथमिकता दी गई, जबकि अन्य मामलों में लंबे समय तक मुकदमे की सुनवाई न होने को जमानत का आधार माना गया।
अब इस कानूनी मुद्दे पर बड़ी पीठ के विचार के लिए रास्ता खुला है। बड़ी पीठ का निर्णय यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होगा कि विशेष कानूनों की कठोर जमानत शर्तों और मौलिक अधिकारों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए।
क्या है इस फैसले का महत्व?
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी आरोपी की स्वतंत्रता को केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर अनिश्चितकाल तक सीमित नहीं किया जा सकता। कानून का उद्देश्य अपराधों पर नियंत्रण और न्याय सुनिश्चित करना है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया भी समयबद्ध और निष्पक्ष होनी चाहिए।
यह फैसला विचाराधीन कैदियों के अधिकारों, संवैधानिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में सुनवाई में देरी होते ही जमानत स्वतः मिल जाएगी। अदालत मामले की परिस्थितियों, देरी की प्रकृति और अन्य कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय करेगी।












