नई दिल्ली (Sun, 09 Nov 2025) — अपने मनमाफिक फैसले थोपने के आदी कॉलेजों पर अब शिकंजा कसने जा रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि प्रवेश रद्द करने वाले छात्रों की Fees Refund में कोई देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यूजीसी ने चेतावनी दी है कि आदेश नहीं मानने वाले संस्थानों की मान्यता रद्द करने से लेकर वित्तीय अनुदान रोकने तक की कार्रवाई की जाएगी। यह पहल देशभर में फंसी लगभग 20 करोड़ रुपये की छात्र फीस को वापस कराने की दिशा में बड़ी राहत है।
2 हजार छात्रों के 20 करोड़ रुपये अटके
देश के विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में करीब 2 हजार छात्रों ने फीस जमा करने के बाद प्रवेश रद्द करा दिया था, लेकिन उनकी फीस अब तक वापस नहीं की गई। औसत रूप से हर छात्र की करीब 1 लाख रुपये की राशि फंसी है। यूजीसी के अनुसार, ऐसी शिकायतें पिछले कुछ महीनों में लगातार बढ़ रही थीं। शिक्षा मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद अब आयोग ने बैकडेटेड नोटिस जारी किया है।
इसमें Fee Refund Policy 2018 का हवाला देते हुए निर्देश दिया गया है कि तय तिथि में एडमिशन रद्द करने वाले छात्रों को बगैर किसी बहाने के फीस लौटाई जाए।
महत्वपूर्ण निर्देश: किन्हें मिलेगी कितनी फीस?
यूजीसी ने मौजूदा शैक्षणिक सत्र (2025-26) और इससे पहले के लंबित मामलों के लिए निम्न निर्देश जारी किए हैं:
- 30 सितंबर 2025 तक एडमिशन रद्द करने वाले छात्रों को पूरी फीस वापस की जाएगी।
- 31 अक्टूबर 2025 तक रद्द कराने पर प्रोसेसिंग फीस के रूप में ₹1000 काटे जाएंगे, बाकी राशि लौटानी होगी।
- इसके बाद आने वाले रिफंड अनुरोधों पर संस्थान अपनी नीति के अनुसार फैसला करेंगे, लेकिन पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है।
यूजीसी ने कहा कि यह फैसला सिर्फ मौजूदा सेशन के लिए ही नहीं, बल्कि पिछले वर्षों में लंबित सभी मामलों पर भी लागू होगा। संस्थानों को तुरंत लंबित रिफंड जारी करने को कहा गया है।
क्यों जरूरी हुआ UGC का दखल?
आयोग की तरफ से बताया गया है कि कई संस्थान रिफंड देने में टालमटोल कर रहे थे। छात्र और उनके अभिभावक होस्टल, फीस, और अन्य खर्चों का बोझ झेलते हुए फंस गए थे। 2021 से 2024 के बीच यूजीसी ने हस्तक्षेप कर 30 करोड़ रुपये से अधिक की राशि 5 हजार से ज्यादा छात्रों को वापस कराई थी।
इस बार यदि आदेशों का उल्लंघन होता है तो यूजीसी ने साफ चेतावनी दी है — मान्यता रद्द करने और एडमिशन पर रोक लगाने से भी परहेज नहीं किया जाएगा।
छात्रों में राहत, संस्थानों में घबराहट
यूजीसी के इस आदेश के बाद जहां छात्र समुदाय में संतोष है, वहीं कई प्राइवेट कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में बेचैनी बढ़ गई है। फीस रिफंड न देने के पीछे आमतौर पर ‘संस्थान-नीति’ या ‘फाइनेंशियल कंडीशन’ का हवाला दिया जाता था, लेकिन अब नियामक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि फ़ीस पर संस्थान का विशेष अधिकार नहीं है — यह छात्र का अधिकार है।













