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युवाओं की भूमिका से तेज हो रहा न्यायपालिका का डिजिटल बदलाव, तकनीक नहीं ले सकती मानवीय निर्णय की जगह: सीजेआई सूर्यकांत

On: June 7, 2026
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तकनीक नहीं ले सकती मानवीय निर्णय की जगह, सीजेआई सूर्यकांत
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नई दिल्ली|07 जून 2026: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा है कि देश के युवा वकील, न्यायिक अधिकारी और कानूनी पेशेवर न्यायपालिका में हो रहे तकनीकी बदलाव के सबसे बड़े प्रेरक बनकर उभरे हैं। उनका मानना है कि नई पीढ़ी की सीखने और बदलाव को अपनाने की क्षमता न्यायिक व्यवस्था को आधुनिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

ऑक्सफोर्ड यूनियन में आयोजित कार्यक्रम के दौरान “संवैधानिक वादे से डिजिटल वास्तविकता: एआई और तकनीकी उन्नति के युग में न्याय की सुरक्षा” विषय पर अपने विचार रखते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने न्यायपालिका में तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी और तेज बना सकती है, लेकिन यह कभी भी मानवीय निर्णय और संवेदनशीलता का विकल्प नहीं बन सकती।

सीजेआई ने कहा कि भारत के कानूनी क्षेत्र में कार्यरत युवा पेशेवर नई तकनीकों को बेहद तेजी से अपना रहे हैं। चाहे जिला न्यायालयों में कार्यरत न्यायिक अधिकारी हों, सरकारी अधिवक्ता हों या फिर कॉर्पोरेट क्षेत्र में कानूनी सलाह देने वाले विशेषज्ञ, सभी ने तकनीकी बदलावों को स्वीकार करने में उल्लेखनीय तत्परता दिखाई है।

उन्होंने कहा कि यही युवा सोच और नवाचार की भावना भारतीय न्यायपालिका में सुधारात्मक परिवर्तनों को गति दे रही है। उनके अनुसार, न्यायिक प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सुलभ और दक्ष बनाने में युवा कानूनी पेशेवरों का योगदान लगातार बढ़ रहा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्षमताओं पर चर्चा करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि एआई प्रणाली बड़ी मात्रा में कानूनी दस्तावेजों और आंकड़ों का बेहद तेज गति से विश्लेषण कर सकती है। यह प्रक्रियात्मक रुझानों की पहचान करने, प्रशासनिक बाधाओं को कम करने और न्यायिक कार्यप्रणाली को अधिक सुव्यवस्थित बनाने में मददगार साबित हो सकती है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्याय केवल तथ्यों और आंकड़ों का विश्लेषण भर नहीं है। न्यायिक निर्णयों में मानवीय संवेदना, नैतिक विवेक और परिस्थितियों की गहन समझ की आवश्यकता होती है। ये ऐसे गुण हैं जिन्हें कोई भी तकनीक पूरी तरह से नहीं अपना सकती।

सीजेआई ने कहा कि कानून की आत्मा सहानुभूति, नैतिक जिम्मेदारी और मानवीय दृष्टिकोण में निहित है। इसलिए तकनीक न्यायपालिका की सहायता कर सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय में मानवीय विवेक की भूमिका हमेशा सर्वोपरि रहेगी।

उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका का भविष्य तकनीक और मानवीय मूल्यों के संतुलित समन्वय में है, जहां डिजिटल नवाचार न्याय तक पहुंच को आसान बनाए, लेकिन न्याय के मानवीय स्वरूप को प्रभावित न करे।

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