नई दिल्ली, 8 नवंबर 2025 (शनिवार): न्याय को धरातल पर उतारने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को कहा कि “सामाजिक न्याय की वास्तविक परिभाषा तभी पूरी होती है जब न्याय हर व्यक्ति तक उसकी भाषा और समझ के अनुरूप पहुंचे।”
उन्होंने न्याय व्यवस्था में भाषाई सहजता और स्थानीयकरण पर जोर देते हुए कहा— न्याय की भाषा वही होनी चाहिए, जो न्याय पाने वाले को समझ आए।
🏛️ ‘Legal Aid System’ पर फोकस: भाषा, पहुंच और व्यवहारिकता का मेल
नालसा (National Legal Services Authority) के राष्ट्रीय सम्मेलन और विधिक सेवा दिवस के मौके पर पीएम मोदी ने कानूनी सहायता तंत्र (Legal Aid System) की मजबूती और उसकी जमीनी उपलब्धता पर विस्तार से बात की।
उन्होंने कहा कि फैसले और कानूनी दस्तावेज़ स्थानीय भाषा में उपलब्ध होने चाहिए, ताकि कानून का अनुपालन बेहतर तरीके से हो और मुकदमेबाज़ी कम हो।
“जब सामान्य नागरिक अपनी भाषा में कानून समझेगा, तो न्याय की राह उसके लिए और सरल हो जाएगी।”
🔍 सम्मेलन के मुख्य पहलू
- PM ने सामुदायिक मध्यस्थता प्रशिक्षण मॉड्यूल का शुभारंभ किया, जो भारतीय परंपरा में संवाद और सहमति से विवाद समाधान को आधुनिक समर्थन देता है।
- इस अवसर पर कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई, नालसा के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस सूर्यकांत और सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों के कई न्यायाधीश मौजूद थे।
📊 आंकड़ों में ‘Legal Aid System’ की प्रगति
- पिछले तीन वर्षों में सरकारी कानूनी सहायता परामर्श प्रणाली के तहत करीब 8 लाख आपराधिक मामलों का निस्तारण किया गया।
- 2015-16 में नालसा का बजट ₹68 करोड़ था, जो 2025-26 में बढ़कर ₹400 करोड़ पहुंच गया है—यह सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है।
🗣️ PM मोदी की दृष्टि: ‘Ease of Justice’ से ‘Ease of Living’ तक
प्रधानमंत्री ने कहा कि “Ease of Doing Business तब ही पूरी तरह संभव है, जब Ease of Justice सुनिश्चित हो।”
उन्होंने ई-कोर्ट्स से लेकर स्थानीय भाषाओं में फैसलों के प्रावधान तक को न्याय प्रणाली की सुलभता से जोड़ते हुए बताया कि आगे और कई सुधार किए जाएंगे।
⚖️ मुख्य न्यायाधीश की बात: न्याय का प्रकाश अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे
भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई ने महात्मा गांधी को याद करते हुए कहा –
“जब भी कोई निर्णय लें, तो सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति के बारे में सोचें। तभी सामाजिक न्याय की धारा समृद्ध होगी।”
जस्टिस सूर्यकांत ने भी कहा कि कानूनी सहायता सिर्फ अधिकारों की किताब नहीं, बल्कि गरीबों और वंचितों के जीवन में व्यावहारिक राहत का माध्यम बननी चाहिए।













