बारामती, 29 जनवरी 2026: बारामती की हवा गुरुवार सुबह कुछ भारी थी। सड़कों पर भीड़ थी, लेकिन शोर नहीं—सिर्फ सिसकियों और नारों के बीच एक गहरी खामोशी। अजित पवार अंतिम संस्कार के लिए हजारों लोग अपने ‘दादा’ को आखिरी विदाई देने उमड़ पड़े। राष्ट्रीय ध्वज में लिपटा पार्थिव शरीर जब काटेवाडी से विद्या प्रतिष्ठान मैदान पहुंचा, तो भीड़ से एक ही स्वर उठा—“अजित दादा अमर रहे।”
राजकीय सम्मान के साथ हुए अंतिम संस्कार में परिवार, समर्थक और तमाम राजनीतिक नेता मौजूद थे। बेटे पार्थ और जय पवार ने पिता को मुखाग्नि दी। महाराष्ट्र पुलिस ने सलामी दी, शोक का बिगुल बजा, और देखते-देखते एक युग पंचतत्व में विलीन हो गया।
अंतिम यात्रा: छह किलोमीटर, भावनाओं का सैलाब
सुबह करीब 9 बजे शुरू हुई अंतिम यात्रा लगभग छह किलोमीटर तक चली। रास्ते भर लोग फूल बरसाते रहे, कई हाथ folded थे, कई आंखें नम। पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी अस्पताल से पार्थिव शरीर को पहले गांव लाया गया, फिर अंतिम दर्शन के लिए मैदान में रखा गया।
दोपहर 12:10 बजे अंतिम संस्कार की रस्में पूरी की गईं। उस समय का मौन, किसी भाषण से अधिक बोलता था।
परिवार का दर्द: सुनेत्रा के पास खड़ी रहीं सुप्रिया
इस शोक में सबसे मार्मिक दृश्य परिवार का था। पत्नी सुनेत्रा पवार—जो राज्यसभा सदस्य हैं—स्पष्ट रूप से भावनाओं से भरी दिखीं। उनके पास खड़ी सुप्रिया सुले बार-बार उन्हें संभालती रहीं। यह दृश्य कैमरों में कैद हुआ, लेकिन उससे पहले लोगों के दिलों में उतर गया।
बेटे पार्थ और जय ने संयम के साथ अंतिम संस्कार की परंपराएं निभाईं। पिता को मुखाग्नि देते समय उनके चेहरे पर एक साथ गर्व, दुख और स्तब्धता दिखाई दी।
नेताओं की मौजूदगी, श्रद्धांजलि का सिलसिला
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उद्धव ठाकरे, केंद्रीय मंत्री अमित शाह, नितिन गडकरी, आंध्र प्रदेश के नेता नारा लोकेश, प्रफुल्ल पटेल सहित कई वरिष्ठ नेता उपस्थित रहे। यह उपस्थिति केवल राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के प्रति सम्मान थी, जिसे बारामती ‘दादा’ कहकर पुकारता था।
हादसा जिसने सबको स्तब्ध कर दिया
बुधवार सुबह विमान दुर्घटना में अजित पवार का निधन हो गया था। वे मुंबई से बारामती जिला परिषद चुनाव प्रचार के लिए जा रहे थे। बारामती हवाई अड्डे पर लैंडिंग के दौरान विमान हादसे का शिकार हुआ और आग लग गई। इस दुर्घटना में अजित पवार सहित पांच लोगों की मौत हुई।
इस खबर ने महाराष्ट्र की राजनीति ही नहीं, पूरे राज्य को झकझोर दिया।
‘दादा’ क्यों थे बारामती के लिए खास?
पुणे से करीब 100 किलोमीटर दूर इस क्षेत्र में विकास की जो तस्वीर आज दिखती है, उसे लोग अजित पवार की पहचान मानते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें समस्याएं लेकर कभी दरवाजा खटखटाने की जरूरत नहीं पड़ी—‘दादा’ खुद पहल करते थे।
सिंचाई परियोजनाएं, शिक्षा संस्थान, सड़कें, उद्योग—बारामती के विकास की कहानी में उनका नाम स्थायी रूप से जुड़ चुका है।
निष्कर्ष
अजित पवार अंतिम संस्कार केवल एक राजनीतिक नेता की विदाई नहीं थी। यह उस रिश्ते की विदाई थी, जो एक नेता और जनता के बीच सालों में बना था। नम आंखों, धीमे नारों और शोक के बिगुल के बीच बारामती ने अपने ‘दादा’ को अलविदा कहा—लेकिन यादें, काम और किस्से अब भी वहीं हैं, उसी मिट्टी में।












