लखनऊ, 24 अप्रैल 2026। उत्तर प्रदेश में खेती अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि तकनीक और नवाचार का संगम बनती जा रही है। मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने शुक्रवार को उत्तर जोन के क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन में कहा कि प्रदेश में ‘लैब टू लैंड मॉडल’ के प्रभाव से कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2017 के बाद राज्य की कृषि विकास दर 8 प्रतिशत से बढ़कर करीब 18 प्रतिशत तक पहुंच गई है—जो किसी भी कृषि प्रधान राज्य के लिए बड़ा संकेत है।
लैब टू लैंड मॉडल से बदल रही खेती की तस्वीर
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में साफ किया कि अब नीतियां कागज़ों तक सीमित नहीं रहीं। लैब टू लैंड मॉडल के जरिए वैज्ञानिक सीधे खेतों तक पहुंच रहे हैं। वे पहले स्थानीय स्तर पर तकनीकों का प्रदर्शन करते हैं और फिर उसे किसानों के खेतों में लागू कराते हैं। यही कारण है कि आज गांव-गांव में कृषि गोष्ठियां, प्रशिक्षण कार्यक्रम और संवाद लगातार हो रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु और मिट्टी के अनुसार एग्रो-क्लाइमेटिक जोन आधारित रणनीति अपनाई गई है। इसका फायदा यह हुआ कि किसान अब अपनी जमीन के हिसाब से सही फसल और तकनीक का चयन कर पा रहे हैं।
कृषि को वैल्यू एडिशन से जोड़ने पर जोर
मुख्यमंत्री ने खेती को सिर्फ उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय उसे वैल्यू एडिशन से जोड़ने की जरूरत पर बल दिया। उनका कहना था कि जब तक किसान अपने उत्पाद को प्रोसेसिंग और बाजार से नहीं जोड़ेंगे, तब तक उनकी आय में स्थायी वृद्धि संभव नहीं है।
उन्होंने आगरा में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र का जिक्र करते हुए कहा कि इसके शुरू होने से प्रदेश में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा मिलेगा और किसानों को बेहतर बाजार मिलेगा।
केवीके और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने बदली दिशा
2017 से पहले प्रदेश में 69 कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) निष्क्रिय अवस्था में थे, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। केंद्र सरकार के सहयोग से 20 नए केवीके स्थापित किए गए और पुराने केंद्रों को सक्रिय किया गया। आज ये केंद्र किसानों को नई तकनीक, बीज और प्रशिक्षण उपलब्ध करा रहे हैं।
इसके साथ ही राज्य के सभी नौ कृषि जलवायु क्षेत्रों में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं, जो आधुनिक खेती को नई दिशा दे रहे हैं। यही वजह है कि जहां पहले किसान साल में एक फसल लेते थे, वहीं अब कई क्षेत्रों में तीन-तीन फसलें ली जा रही हैं।
उत्तराखंड और पंजाब ने भी दिखाई नई राह
सम्मेलन में Ganesh Joshi (उत्तराखंड) ने बताया कि उनके राज्य में सुगंधित फसलों को बढ़ावा देने के लिए ‘महक क्रांति’ अभियान शुरू किया गया है, जिससे करीब 50 हजार किसान जुड़े हैं। कीवी, ड्रैगन फ्रूट और मशरूम जैसी फसलों पर भी जोर दिया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि 2030 तक उत्तराखंड सेब उत्पादन में देश में पहला स्थान हासिल करेगा।
वहीं पंजाब के उद्यान मंत्री Mahendra Bhagat ने कहा कि उनका राज्य अब पारंपरिक धान-गेहूं चक्र से बाहर निकलकर फसल विविधीकरण की ओर बढ़ रहा है। किसानों को ड्रैगन फ्रूट, लीची और आम जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है।
खेती में बदलाव का नया दौर
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में लैब टू लैंड मॉडल ने खेती को प्रयोगशाला से निकालकर सीधे खेतों तक पहुंचा दिया है। अब किसान सिर्फ उत्पादन करने वाला नहीं, बल्कि तकनीक और बाजार से जुड़ा एक जागरूक उद्यमी बनता दिख रहा है। आने वाले वर्षों में यह बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाला साबित हो सकता है।










