नई दिल्ली(Wed, 13 May 2026)। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक तेल बाजार पर उसके असर के बीच भारत में ईंधन बचत को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा संकेत दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफिले में चलने वाली गाड़ियों की संख्या में करीब 50 प्रतिशत कटौती कर दी गई है। बुधवार को कैबिनेट बैठक से पहले राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री के काफिले में सिर्फ दो गाड़ियां दिखाई दीं, जिसने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी।
सरकार के इस कदम को केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि संसाधनों के “तर्कसंगत उपयोग” के बड़े संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री की पहल के बाद गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई केंद्रीय मंत्रियों ने भी अपने सुरक्षा काफिलों में गाड़ियों की संख्या घटा दी है।
भाजपा शासित राज्यों में भी दिखा असर
केंद्र की इस पहल का असर भाजपा शासित राज्यों में भी तेजी से देखने को मिला। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा कुछ राज्यपालों ने भी सरकारी काफिलों में वाहनों की संख्या सीमित करने का फैसला लिया है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह कदम केवल ईंधन बचत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक खर्चों को अधिक व्यावहारिक और जिम्मेदार बनाने की दिशा में भी एक संदेश है। हालांकि, सरकार ने साफ किया है कि सुरक्षा मानकों से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।
‘ब्लू बुक’ के तहत सुरक्षा व्यवस्था बरकरार
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की सुरक्षा संभालने वाली SPG (स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप) के अधिकारियों के मुताबिक, सुरक्षा प्रोटोकॉल से जुड़ी “ब्लू बुक” के सभी नियम पहले की तरह लागू रहेंगे। इसी के तहत काफिलों को “रैशनलाइज” यानी जरूरत के हिसाब से व्यवस्थित किया जा रहा है।
‘ब्लू बुक’ में वीवीआईपी सुरक्षा से जुड़े विस्तृत दिशा-निर्देश दर्ज होते हैं, जिनका पालन सुरक्षा एजेंसियों के लिए अनिवार्य होता है। अधिकारियों के अनुसार, सुरक्षा घेरे को प्रभावित किए बिना गाड़ियों की संख्या कम की जा रही है।
दिलचस्प बात यह भी है कि सरकार ने भविष्य में सुरक्षा काफिलों में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को शामिल करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, फिलहाल नई ईवी गाड़ियों की खरीद का कोई प्रस्ताव नहीं है। मौजूदा संसाधनों के बेहतर उपयोग पर ही जोर दिया जा रहा है।
पश्चिम एशिया संकट और बढ़ती तेल कीमतों का असर
दरअसल, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है, ऐसे में सरकार पेट्रोलियम उत्पादों के उपयोग को नियंत्रित करने और आयात बिल कम रखने की रणनीति पर काम कर रही है।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी की अपील को “खर्च में कटौती” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि सरकार विकास कार्यों, पूंजीगत निवेश और कल्याणकारी योजनाओं में कोई कटौती नहीं कर रही है।
अधिकारी के मुताबिक, “यह संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग का मामला है। आर्थिक संकट के समय आमतौर पर सरकारें विकास और कल्याणकारी योजनाओं का खर्च घटाती हैं, लेकिन भारत सरकार ऐसा नहीं कर रही। योजनाएं पहले की तरह जारी रहेंगी।”
हैदराबाद से शुरू हुआ था बदलाव का संकेत
सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में हैदराबाद से देशवासियों से ईंधन बचत और विदेशी निर्भरता कम करने की अपील की थी। उसी के बाद से सरकारी स्तर पर बदलाव दिखाई देने लगे।
बताया जा रहा है कि असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने पहुंचे प्रधानमंत्री के काफिले में भी गाड़ियों की संख्या पहले से कम रखी गई थी। हालांकि सुरक्षा कारणों से विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही है।
अब केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में भी सरकारी वाहनों के उपयोग को लेकर नई समीक्षा शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में कई विभागों में “जरूरत आधारित वाहन उपयोग” की नीति लागू की जा सकती है।
सरकार का बड़ा संदेश क्या है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम केवल ईंधन बचाने की प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि जनता को “संयमित उपभोग” का संदेश देने की कोशिश भी है। ऐसे समय में जब वैश्विक हालात आर्थिक दबाव बढ़ा रहे हैं, सरकार यह दिखाना चाहती है कि शीर्ष नेतृत्व खुद भी संसाधनों की बचत में उदाहरण पेश कर रहा है।











